नहीं रहे दिग्गज समाजशास्त्री बटेले

नवभारत टाइम्स

जाने-माने समाजशास्त्री प्रो. आंद्रे बेटेले अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में समाजशास्त्र को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनकी पुस्तक 'कास्ट, क्लास एंड पावर' आज भी प्रासंगिक है। प्रो. बेटेले ने भारतीय समाज की जटिलताओं पर गहरा शोध किया।

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नई दिल्ली: समाजशास्त्र के दिग्गज प्रो. आंद्रे बेटेले का 91 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स (DSE) में समाजशास्त्र विभाग को देश के अग्रणी केंद्रों में से एक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रो. बेटेले, जो प्रो. एमेरिटस के रूप में जुड़े रहे, अपनी पुस्तक " Caste, Class and Power " (1965) के लिए जाने जाते हैं, जिसे आज भी एक क्लासिक माना जाता है। उनका अकादमिक जीवन जिज्ञासा, अनुशासन और सामाजिक न्याय के सवालों से गहराई से जुड़ा था। वे समाजशास्त्र को केवल एक विषय नहीं, बल्कि समाज को समझने और उसे बेहतर बनाने का एक औजार मानते थे।

प्रो. बेटेले का जन्म एक बंगाली मां और फ्रांसीसी पिता के घर हुआ था। कलकत्ता यूनिवर्सिटी से पढ़ाई पूरी करने के बाद वे दिल्ली आए। उन्होंने छात्रों को सोचने, सवाल पूछने और स्थापित धारणाओं को चुनौती देने के लिए हमेशा प्रोत्साहित किया, जिसके कारण उनके व्याख्यान बेहद लोकप्रिय थे। दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के पुराने छात्र आज भी उस दौर को याद करते हैं जब प्रो. बेटेले कैंटीन में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, प्रो. बी.एन. गांगुली, डॉ. ए.एम. खुसरो, प्रो. के.एन. राज और डॉ. अमर्त्य सेन जैसे दिग्गजों के साथ बैठा करते थे। इन चर्चाओं में उनके छात्र भी शामिल होते थे और बहसें हमेशा मर्यादित और ज्ञानवर्धक होती थीं।
प्रो. बेटेले ने भारतीय समाज की जटिलताओं, असमानताओं, वर्ग, जाति और सत्ता संरचनाओं का गहराई से अध्ययन किया। उनका शोध वैश्विक दृष्टिकोण और स्थानीय हकीकत के बीच संतुलन का एक बेहतरीन उदाहरण था। उनका मानना था कि समाजशास्त्र तभी सार्थक है जब वह समाज के सबसे कमजोर और हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज बन सके। वे समाजशास्त्र को सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रखते थे, बल्कि उसे समाज की समस्याओं को सुलझाने का एक व्यावहारिक माध्यम मानते थे।

एक शिक्षक के तौर पर प्रो. बेटेले बेहद मिलनसार और मानवीय थे। वे छात्रों की पढ़ाई से जुड़ी समस्याओं के साथ-साथ उनकी व्यक्तिगत चिंताओं को भी ध्यान से सुनते थे। कई विद्यार्थियों के लिए वे सिर्फ एक प्रोफेसर नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक और प्रेरणा के स्रोत थे। प्रो. बेटेले कभी भी किसी विचारधारा से बंधे नहीं रहे, बल्कि हमेशा तर्क और प्रमाण के आधार पर अपनी बात रखते थे। उन्होंने जाति को एक बंद व्यवस्था के बजाय बदलाव के संदर्भ में समझा। साथ ही, उन्होंने आधुनिक भारत में वर्ग, शिक्षा और राजनीति के बढ़ते प्रभावों पर भी प्रकाश डाला।

दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स के डायरेक्टर प्रो. राम सिंह ने प्रो. बेटेले के निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि यह भारतीय समाजशास्त्र में एक युग का अंत है। उन्होंने कहा, "एक ऐसा युग जिसमें गंभीरता, निष्पक्षता और स्पष्ट लेखन सबसे ऊपर था।" प्रो. बेटेले का काम समाजशास्त्र के क्षेत्र में हमेशा एक मिसाल बना रहेगा। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। उन्होंने समाज को देखने का एक नया नजरिया दिया, जो आज भी प्रासंगिक है।