सदन में अविश्वास

नवभारत टाइम्स

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही बाधित होने पर चिंता जताई है। बजट सत्र के कई घंटे बर्बाद हो चुके हैं। विपक्ष को बोलने का मौका न मिलने की शिकायत है। सदन में गतिरोध बना हुआ है। संसद की गरिमा प्रभावित हो रही है। यह सत्र नकारात्मक कारणों से चर्चा में रहा है।

parliamentary stalemate opposition moves towards no confidence motion proceedings disrupted
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की बजट सत्र सुचारू रूप से चलाने की अपील के बावजूद, संसद में गतिरोध जारी है, जिससे सत्र के 19.13 घंटे से अधिक का समय बर्बाद हो चुका है। विपक्ष का आरोप है कि उन्हें सदन में अपनी बात रखने का मौका नहीं मिल रहा, खासकर राहुल गांधी को बजट पर बोलने की अनुमति को लेकर विवाद है। यह स्थिति संसद की गरिमा को ठेस पहुंचा रही है, क्योंकि महत्वपूर्ण विधायी चर्चाएं अधूरी रह गई हैं और विपक्ष को लग रहा है कि पीठासीन अधिकारी निष्पक्ष व्यवहार नहीं कर रहे, जिससे सदन के संरक्षक के प्रति उनका भरोसा टूट रहा है। कांग्रेस की महिला सांसदों द्वारा स्पीकर को लिखी गई चिट्ठी और उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी इस बढ़ते अविश्वास का संकेत है, जो सत्र को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है।

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने पिछले हफ्ते, शुक्रवार को सांसदों से सदन की कार्यवाही को सुचारू रूप से चलने देने की गुहार लगाई थी। उन्होंने बताया था कि बजट सत्र के अब तक 19.13 घंटे बर्बाद हो चुके हैं। लेकिन, उनकी अपील के कुछ ही देर बाद सदन में फिर से हंगामा शुरू हो गया और कार्यवाही को स्थगित करना पड़ा। तब से लेकर सोमवार तक, यह बर्बाद हुए समय का आंकड़ा और भी बढ़ गया है। दोनों सदनों में गतिरोध की स्थिति बनी हुई है। ऐसा लग रहा है कि अब सुलह की कोशिशों से ज्यादा टकराव के बहाने तलाशे जा रहे हैं। इस पूरे हंगामे का खामियाजा संसद की गरिमा को भुगतना पड़ रहा है।
इस बजट सत्र में अभी तक कोई भी महत्वपूर्ण चर्चा ठीक से पूरी नहीं हो पाई है। कई अहम विधायी मुद्दे अधर में लटके हुए हैं। विपक्ष का कहना है कि लोकसभा में राहुल गांधी को बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा है। सोमवार को एक बार ऐसा लगा कि शायद कोई रास्ता निकल आए, जब नेता प्रतिपक्ष और स्पीकर की मुलाकात हुई। हालांकि, बाद में यह पेच फंस गया कि राहुल गांधी सिर्फ बजट पर बोल सकते हैं, किसी और विषय पर नहीं।

सदन को चलाने के लिए जितने जरूरी नियम-कायदे हैं, उतनी ही अहमियत परंपराओं की भी है। लोकतंत्र की यह परंपरा रही है कि सभी को अपनी बात रखने का मौका मिले, चाहे वह सत्ता पक्ष में हो या विपक्ष में। लेकिन, विपक्ष में यह भावना पनप रही है कि आसन (स्पीकर की कुर्सी) उनके साथ समान व्यवहार नहीं कर रहा है। सरकार के पास अपनी बात रखने के लिए कई मंच और मौके होते हैं, लेकिन विपक्ष के लिए सबसे बड़ा मंच संसद का सदन ही होता है, जहां वह सरकार से सवाल पूछ सकता है। ये सवाल सरकार की जवाबदेही तय करने और नीतियों में संतुलन लाने के लिए बहुत जरूरी होते हैं।

पीठासीन अधिकारी, यानी स्पीकर, सदन के संरक्षक की भूमिका में होते हैं। उनसे निष्पक्षता की उम्मीद की जाती है। विपक्ष को उनसे यह भरोसा रहता है कि वह सभी को बराबरी का मौका देंगे। यह चिंताजनक बात है कि यह भरोसा टूट रहा है। इसका सबूत कांग्रेस की महिला सांसदों की तरफ से ओम बिरला को लिखी गई चिट्ठी है। साथ ही, यह खबर भी है कि स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी चल रही है। अगर ऐसा होता है, तो भले ही विपक्ष के पास संख्या बल न हो, लेकिन इसका प्रतीकात्मक महत्व बहुत ज्यादा होगा।

यह सत्र अभी तक नकारात्मक वजहों से ही ज्यादा चर्चा में रहा है। सांसदों का निलंबन और प्रधानमंत्री का लोकसभा में सुरक्षा कारणों से भाषण न देना, ये कुछ ऐसी घटनाएं हैं जो जनता के सामने जनप्रतिनिधियों की अच्छी तस्वीर पेश नहीं करतीं। इससे जनता का विश्वास जनप्रतिनिधियों पर कम होता है।