ज़ायक़ेदार फरा-चटनी

नवभारत टाइम्स

उत्तर प्रदेश का ज़ायक़ेदार फरा एक पारंपरिक देसी व्यंजन है। इसे आटे से बनाया जाता है और दाल भरकर उबाला या भाप में पकाया जाता है। पकने के बाद इसे धनिया-लहसुन की चटनी के साथ परोसा जाता है। यह व्यंजन भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

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उत्तर प्रदेश का पारंपरिक व्यंजन फरा, जिसे उड़द और चना दाल के मसालेदार मिश्रण से भरकर उबाला या भाप में पकाया जाता है, सर्दियों और मकर संक्रांति पर खूब पसंद किया जाता है। यह गिल्ली-डंडा के खेल में इस्तेमाल होने वाली गिल्ली जैसा दिखता है और इसके कई क्षेत्रीय नाम हैं, जैसे बिहार-झारखंड में पीठा, उत्तराखंड में पुठा या पुठिया और दक्षिण भारत में कोझुकट्टई। इसका संबंध संस्कृत के शब्द ‘पिष्ट’ से है, जिसका अर्थ है पिसा हुआ।

फरा, उत्तर प्रदेश का एक खास पकवान है। इसे बनाने के लिए आटे की छोटी-छोटी लोइयां तैयार की जाती हैं। इन लोइयों के अंदर उड़द दाल, चना दाल, लहसुन, अदरक, हरी मिर्च और तरह-तरह के मसालों का मिश्रण भरा जाता है। फिर इन्हें या तो उबाला जाता है या भाप में पकाया जाता है। पकने के बाद, इसे धनिया और लहसुन की चटनी के साथ परोसा जाता है।
इस व्यंजन का आकार गिल्ली-डंडा खेल की गिल्ली जैसा होता है। कुछ जगहों पर गिल्ली को पुल्ली भी कहते हैं। शायद इसी वजह से कुछ इलाकों में इसे पुली कहा जाने लगा। इसी से मिलता-जुलता नाम बंगाल में पुले पिठे के तौर पर मशहूर हुआ। बिहार और झारखंड में इसे पीठा के नाम से जाना जाता है। उत्तराखंड में यह पुठा या पुठिया कहलाता है, जबकि दक्षिण भारत में इसे कोझुकट्टई कहते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यंजन का संबंध संस्कृत के मूल शब्द ‘पिष्ट’ से है। ‘पिष्ट’ का मतलब होता है पिसा हुआ या चूर्ण। यह पकवान खासकर सर्दियों के मौसम में और मकर संक्रांति के त्यौहार पर खूब बनाया और खाया जाता है। यह परंपरा कई जगहों पर बहुत आम है।