डायबिटीज़ जांच के लिए सिर्फ HbA1c टेस्ट पर न करें भरोसा

नवभारत टाइम्स

एम्स दिल्ली की रिसर्च में खुलासा हुआ है कि भारत में HbA1c टेस्ट हर मरीज के लिए भरोसेमंद नहीं है। खून की कमी और हीमोग्लोबिन से जुड़ी बीमारियों के कारण रिपोर्ट असल ब्लड शुगर से अलग आ सकती है। यह टेस्ट पिछले दो से तीन महीने की औसत ब्लड शुगर बताता है।

dont rely on hba1c test new warning for diabetes detection
नई दिल्ली: एम्स दिल्ली की एक नई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन यानी HbA1c टेस्ट, जो आमतौर पर टाइप-2 डायबिटीज की पहचान और इलाज की निगरानी के लिए इस्तेमाल होता है, भारत के हर मरीज के लिए भरोसेमंद नहीं है। यह रिसर्च मेडिकल जर्नल 'द लैंसेट' में छपी है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में खून की कमी, हीमोग्लोबिन से जुड़ी बीमारियां और G6PD एंजाइम की कमी जैसी समस्याएं बहुत से लोगों में पाई जाती हैं। इन वजहों से HbA1c टेस्ट की रिपोर्ट असल ब्लड शुगर लेवल से अलग आ सकती है।

एम्स के डिपार्टमेंट ऑफ मेडिसिन के डॉ. नवल विक्रम, जो इस रिसर्च टीम का हिस्सा थे, ने बताया कि HbA1c टेस्ट पिछले दो से तीन महीनों के दौरान आपके ब्लड शुगर का औसत बताता है। अच्छी बात यह है कि इसके लिए खाली पेट रहने की जरूरत नहीं होती। इसी सुविधा के कारण डॉक्टर अक्सर यह टेस्ट कराने की सलाह देते हैं।
लेकिन, भारत की आबादी में खून की कमी (एनीमिया) एक आम समस्या है। इसके अलावा, हीमोग्लोबिन से जुड़ी कुछ बीमारियां और G6PD एंजाइम की कमी भी कई लोगों में पाई जाती है। ये सभी स्थितियां HbA1c टेस्ट के नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं। इसका मतलब है कि टेस्ट में जो शुगर लेवल दिख रहा है, वह असल में आपके ब्लड शुगर का सही अंदाजा नहीं दे पा रहा है। इसलिए, भारत में डायबिटीज के मरीजों के लिए इस टेस्ट पर पूरी तरह भरोसा करना मुश्किल हो सकता है।