Lakhs Worth Of Green Crematoriums Turn To Scrap Questions Raised On Municipal Corporations Negligence
कबाड़ बन गए लाखों के हरित शवदाह गृह
नवभारत टाइम्स•
लखनऊ नगर निगम ने कोरोना काल में पर्यावरण बचाने के लिए लाखों के हरित शवदाह गृह खरीदे थे। ये शवदाह गृह अब भैंसा कुंड और गुलाला घाट पर कबाड़ बन गए हैं। इनकी चिमनियों और प्लेटफॉर्म पर झाड़ियां उग आई हैं। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद ये मशीनें शोपीस बनकर रह गई हैं।
कोरोना लहर के दौरान पर्यावरण संरक्षण के मकसद से लाखों रुपये खर्च कर खरीदे गए हरित शवदाह गृह अब कबाड़ बन गए हैं। चार साल पहले नगर निगम ने भैंसा कुंड और गुलाला घाट पर ये शवदाह गृह लगाए थे, ताकि कोरोना संक्रमित शवों का अंतिम संस्कार सुरक्षित तरीके से हो सके और संक्रमण फैले नहीं। लेकिन अब ये करोड़ों की मशीनें शोपीस बनकर रह गई हैं, जिनकी चिमनियों और प्लेटफॉर्म पर झाड़ियां उग आई हैं। नगर निगम ने इन मशीनों की सुध नहीं ली, जबकि इनका मकसद वायु प्रदूषण को कम करना था।
साल 2021-2022 में नगर निगम के आरआर विभाग ने कोरोना की लहर के दौरान तीन हरित शवदाह गृह खरीदे थे। इन मशीनों को इसलिए लगाया गया था ताकि कोरोना से मरने वाले लोगों के शवों का अंतिम संस्कार इस तरह से हो कि धुआं ऊंची चिमनी से बाहर निकले और संक्रमण हवा से किसी दूसरे व्यक्ति तक न फैले। इस खरीद पर आरआर विभाग ने करीब 80 लाख रुपये से ज्यादा का बजट खर्च किया था। लेकिन आज ये मशीनें किसी काम की नहीं रह गई हैं। तत्कालीन आरआर चीफ राम नगीना त्रिपाठी ने इन मशीनों को खरीदते समय कहा था कि इनसे वायु प्रदूषण दूर करने में मदद मिलेगी। फिलहाल, मौजूदा आरआर चीफ मनोज प्रभात का कहना है कि वे इस बात की जानकारी लेंगे कि ये हरित शवदाह गृह क्यों नहीं चल रहे हैं, उसके बाद ही कुछ बता पाएंगे।बैकुंठ धाम में दो ऐसी मशीनें लगाई गई थीं। इनका इस्तेमाल कोरोना संक्रमित शवों के अंतिम संस्कार के लिए होना था। इन मशीनों की तकनीक काफी खास थी। मशीन के चारों तरफ ग्रिल के साथ एक प्लेटफॉर्म बनाया गया था। पहले उस प्लेटफॉर्म पर लकड़ी रखी जाती थी और उसके ऊपर शव को रखा जाता था। मशीन के सबसे नीचे एक प्लेट थी, जिसमें राख इकट्ठा हो जाती थी। आग लगने के बाद शव को ढक दिया जाता था। आग को तेज करने के लिए पंप से हवा अंदर भेजी जाती थी। मशीन के चारों ओर एक मोटी चादर भी लगी थी, ताकि गर्मी बाहर न निकले और दाह संस्कार ठीक से हो जाए। धुआं बाहर निकलने के लिए एक ऊंची चिमनी लगाई गई थी, ताकि धुआं ऊपर चला जाए और आसपास के लोगों को कोई परेशानी न हो। यह भी दावा किया गया था कि इन मशीनों में लकड़ी की खपत कम होती है।
लेकिन आज हकीकत कुछ और है। भैंसा कुंड और गुलाला घाट पर लगे ये शवदाह गृह पूरी तरह से कबाड़ बन चुके हैं। इनकी चिमनियों और प्लेटफॉर्म पर बड़ी-बड़ी झाड़ियां उग आई हैं। यह देखकर लगता है कि नगर निगम ने इन मशीनों की खरीद के बाद इनकी कोई खोज खबर ही नहीं ली। करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद, ये मशीनें सिर्फ दिखावे के लिए रह गई हैं। इनका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण को बचाना और कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकना था, लेकिन अब ये अपने उद्देश्य से भटक गई हैं और सिर्फ कबाड़ का ढेर बनकर रह गई हैं। यह नगर निगम की लापरवाही का एक बड़ा उदाहरण है, जहां जनता के पैसे का सही इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।