सुखनंदन अब मुख्य व्यवस्थाकार बन गए हैं। फाकाकशी के दिनों में उन्होंने व्यवस्थागत कमियों की सूची तैयार की थी। इसमें सबसे ऊपर थी, ‘संवादहीनता’। कुर्सी संभालते ही लोकतंत्र के प्रति वचनबद्धता के क्रम में आमूल-चूल परिवर्तन पर अमल शुरू किया। पहली बैठक में ही उन्होंने संवादहीनता पर प्रहार किया। समस्या जड़ थी, प्रहार में वेग आवश्यक था। अत: लाठी को मध्यस्थ नियुक्त किया गया।
राष्ट्रहित के प्रति संकल्प में अक्सर साजिशें बाधा बनती हैं। सुखनंदन दलगत भावना से ऊपर हैं, इसलिए इस महकमे का कार्य और बढ़ गया है। इन व्यस्तताओं में ध्यान भटका और प्रदर्शन शुरू हो गया। अब लोकतंत्र में प्रदर्शन तो फैशन है और सुखनंदन सादा जीवन, उच्च विचार वाले। इसलिए, उनको इससे क्या ही फर्क पड़ना। समस्या तब बढ़ गई, जब इस फैशन की हवा में नए-नवेले बहने लगे। अब पुरानों की आत्मा इन नयों में बसती है, इसलिए वे भी मौसम के रंग में रंगने लगे। इन स्थितियों को देखते हुए सुखनंदन ने जयचंद को मोर्चे पर लगाया। जयचंद ने सार्वजनिक घोषणा की, ‘अराजक तत्व राष्ट्र की शांति बाधित कर रहे हैं, इनसे सख्ती से निपटा जाएगा।’ सुधर्मा भी घोषणा का यह विडियो देख रही थीं। राष्ट्र और शांति तो समझ में आ गया, लेकिन अराजक तत्व की परिभाषा को लेकर संशय के बादल उमड़ने लगे। चिंता इस वजह से भी थी कि उनके सुपुत्र सुरम्य को भी नई हवा लग रही थी।सुखनंदन के घर में घुसते ही सुधर्मा पूछ बैठीं, ‘ये अराजक तत्व कौन हैं जी?’ इस अनापेक्षित हमले से सुखनंदन थोड़े सकते में आए, लेकिन खुद को संभाल लिया, ‘अराजक वे हैं, जो राज में बाधक हैं।’ ‘बाधक कौन हैं?’ ‘वे जो सवाल पूछते है।’ ‘सवाल से बवाल क्यों?’ सुधर्मा के स्वर में हैरानी थी। ‘क्योंकि, व्यवस्था कांच की शोपीस है, सवालों से चटक जाती है’, कहते हुए सुखनंदन कोपभवन में चले गए।