विपक्षी दलों के बीच चल रही है एक होड़

नवभारतटाइम्स.कॉम
Navbharat Times
पूनम पाण्डे

पेपर लीक के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन अब सिर्फ भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता का सवाल नहीं रह गया है। सोशल मीडिया पर उठी आवाज जंतर-मंतर तक पहुंची, वहां से संसद में गूंजी और अब लगभग हर राजनीतिक दल के एजेंडे का हिस्सा बन चुकी है। इस पूरे घटनाक्रम ने दो तस्वीरें सामने रखी हैं। पहली, युवाओं के भीतर लगातार बढ़ता असंतोष। दूसरी, उसी असंतोष के बीच अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश में जुटे राजनीतिक दलों की रणनीति।
सोशल मीडिया की भूमिका

पिछले कुछ सालों में केंद्र और राज्यों की कई भर्ती परीक्षाएं पेपर लीक के आरोपों से घिरी हैं। इसलिए अब यह व्यवस्था पर भरोसे का संकट बन चुका है। यही वजह है कि इस बार विरोध तेजी से फैला। इसकी शुरुआत भले सोशल मीडिया से हुई हो, लेकिन जल्द ही यह सड़कों तक पहुंच गया। जंतर-मंतर पर जुटती भीड़ ने साफ कर दिया कि यह सिर्फ डिजिटल अभियान नहीं है। हालांकि यह भी उतना ही सच है कि सोशल मीडिया ने इस आंदोलन को गति देने, उसे राष्ट्रीय स्वर देने और युवाओं को जोड़ने में निर्णायक भूमिका निभाई है और लगातार निभा भी रहा है।

जैसे-जैसे आंदोलन को जनसमर्थन मिलने लगा और जंतर-मंतर पर भीड़ बढ़ती गई, विपक्षी दलों की रणनीति भी बदलने लगी। इस पूरे घटनाक्रम में समाजवादी पार्टी अपेक्षाकृत अधिक आक्रामक नजर आई। संसद मार्च के दौरान पार्टी सांसदों का संसद से जंतर-मंतर तक जाना और फिर डिंपल यादव का प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंचना केवल प्रतीकात्मक मौजूदगी नहीं थी। उनकी तस्वीरें और विडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए। उत्तर प्रदेश की राजनीति के संदर्भ में यह रणनीति महत्वपूर्ण भी है, क्योंकि वहां रोजगार और भर्ती का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहा है।

हालांकि विपक्ष की एकजुटता की तस्वीर उतनी सरल नहीं रही। आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस पर ही निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री आवास के बाहर कांग्रेस का प्रदर्शन असली आंदोलन से ध्यान भटकाने की कोशिश है। इस आरोप के पीछे सिर्फ राष्ट्रीय राजनीति नहीं, बल्कि पंजाब की राजनीति का संदर्भ भी दिखाई देता है, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इस प्रतिस्पर्धा की झलक संसद के भीतर भी देखने को मिली। बुधवार को लोकसभा में कांग्रेस नेता के बोलने के बाद सरकार की ओर से किरेन रिजिजू ने जवाब दिया। इस दौरान समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने आपत्ति जताई और स्पीकर से कहा कि क्या आपने इनसे समझौता किया है? इस टिप्पणी को सिर्फ सदन की कार्यवाही तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। विपक्ष के भीतर नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक संदेश देने की कोशिश का भी हिस्सा थी।

रोजगार का सवाल

एक ओर लाखों युवाओं का वास्तविक आक्रोश है तो दूसरी ओर उस आक्रोश की राजनीतिक अभिव्यक्ति पर दावा करने की होड़। कोई इस मुद्दे पर पीछे नहीं दिखना चाहता, क्योंकि उसे पता है कि रोजगार और भर्ती का सवाल आने वाले समय में चुनावी राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है। इसलिए अब संघर्ष सिर्फ सरकार बनाम विपक्ष का नहीं, बल्कि विपक्ष के भीतर ज्यादा राजनीतिक स्पेस हासिल करने का भी है।

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