प्रकृति का संरक्षण ही है ईश्वर के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा

Contributed byआरडी अग्रवाल ‘प्रेमी’|नवभारतटाइम्स.कॉम
nature conservation true devotion to god and the basis of human existence
भारतीय संस्कृति ने पृथ्वी को माता, नदियों को देवी, वायु को प्राण और वृक्षों को देवता का स्थान दिया है। यह केवल आस्था नहीं, जीवन का विज्ञान है। जब हम एक वृक्ष काटते हैं, किसी नदी को प्रदूषित करते हैं या पर्वतों का अंधाधुंध दोहन करते हैं, तब वास्तव में हम अपने ही अस्तित्व को क्षति पहुंचा रहे होते हैं। प्रकृति पर किया गया प्रत्येक आघात आखिरकार मानव जीवन पर ही लौटकर आता है।

आज नदियां प्रदूषित हैं, जंगल सिमट रहे हैं, पक्षियों और वन्य जीवों का संसार उजड़ रहा है। शुद्ध वायु दुर्लभ होती जा रही है और जल, जो जीवन का आधार है, अनेक रोगों का कारण बन रहा है। आधुनिक सुविधाएं आवश्यक हैं, लेकिन यदि विकास प्रकृति के संतुलन को नष्ट कर दे, तो वह प्रगति नहीं, आत्मविनाश का मार्ग बन जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि हमें सिखाती है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका संरक्षक है। जब हम एक पौधा लगाते हैं, जल की प्रत्येक बूंद बचाते हैं, तब यह केवल सामाजिक दायित्व ना रहकर ईश्वर की सृष्टि के प्रति हमारी सच्ची पूजा बन जाता है।
हम पर्यावरण संरक्षण को किसी सरकारी अभियान तक सीमित न रखें, उसे अपने जीवन का संस्कार बनाएं। आने वाली पीढ़ियों को केवल संपत्ति नहीं, स्वच्छ वायु, निर्मल जल और हरित पृथ्वी भी विरासत में देनी होगी। अथर्ववेद में कहा गया है - माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। यानी यह पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र। जब पुत्र अपनी माता की रक्षा करता है, तभी उसका जीवन सार्थक होता है। वास्तविक आध्यात्मिकता मंदिरों में दीप जलाने तक सीमित नहीं। वह प्रत्येक उस कर्म में प्रकट होती है, जिससे सृष्टि का कल्याण हो।

एक वृक्ष लगाना, जल की रक्षा करना, नदियों को स्वच्छ रखना, जीव-जंतुओं के प्रति करुणा रखना और संसाधनों का संयमित उपयोग करना भी उतनी ही बड़ी पूजा है, जितनी ईश्वर की आराधना। पर्यावरण बचाने के साथ-साथ आज अपनी चेतना को जागृत करने की आवश्यकता है। जब मनुष्य यह अनुभव कर लेगा कि प्रकृति और परमात्मा अलग नहीं हैं, तब उसका प्रत्येक कर्म साधना बन जाएगा।

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