Talaq e ahsan New Trouble For Muslim Women After Ban On Triple Talaq
चोर दरवाज़ा साबित हो रहा तलाक़-ए-अहसन
नवभारतटाइम्स.कॉम•
साल 2019 में तीन तलाक पर कानून बन तो गया पर मुस्लिम पत्नियों की मुसीबतों का अंत होता नहीं दिख रहा है। हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत ' तलाक-ए-अहसन ' के एक मामले को मान्यता दे दी। इसी के साथ, मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और 2019 में प्रतिबंधित तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) के बाद तलाक-ए-अहसन के बढ़ते इस्तेमाल पर नई बहस छेड़ दी है। इस केस विशेष में पत्नी सितंबर 2023 से मायके में रह रही थी, जबकि पति ने दारुल कजा (शरिया अदालत) के माध्यम से तलाक की प्रक्रिया पूरी की।
एक और लंबी लड़ाई । तलाक-ए-अहसन आज भी मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मान्य है। मुस्लिम महिलाओं ने एक लंबी लड़ाई के बाद तलाक-ए-बिद्दत पर कानूनी रोक पाई थी लेकिन, कानूनी शिकंजे और गिरफ्तारी के डर से बचने के लिए अब कई मामलों में पति तलाक-ए-अहसन का रास्ता चुन रहे हैं। तलाक-ए-अहसन की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की गई हैं, जिनमें इसे महिलाओं के सम्मान के मौलिक अधिकार के खिलाफ बताया गया है। तलाक-ए-अहसन है क्या । तलाक के इस तरीके में पति अपनी पत्नी को तुहर काल (मासिक धर्म के बीच की अवधि) में केवल एक बार कहता है कि मैंने तुम्हें तलाक दिया। वह इसी बात को एक पत्र या स्पीड पोस्ट के जरिए नोटिस के रूप में भी भेज सकता है। फिर पत्नी तीन महीने का समय (इद्दत की अवधि) काटती है। इस बीच आपसी सहमति से सुलह की जा सकती है। लेकिन, सुलह न हो तो समय पूरा होते ही तलाक स्थायी मान लिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता का कोई नियम नहीं है।
कुरान में जिक्र नहीं । ध्यान दें कि तलाक-ए-अहसन के मामले तब प्रकाश में आने लगे हैं, जब से तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक करार दे दिया गया है। यहां गौर किए जाने योग्य बात है कि तलाक-ए-अहसन का उल्लेख कुरान में कहीं नहीं मिलता है। ऐसे में यह धार्मिक संगठनों द्वारा ईजाद किया हुआ बेबुनियाद तरीका है। इस बीच, कई ऐसे मामले देखे गए जब पत्नी अपने मायके में थी और अचानक उन्हें स्पीड पोस्ट से तलाक का पत्र मिला। तीन महीने बाद तलाक का मान्य मानते हुए पत्नी को मुफ्ती द्वारा जारी फतवा भेज दिया गया। इससे अचानक एक ब्याहता पत्नी तलाकशुदा हो गई।
गरिमा का प्रश्न । महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और सम्मान के साथ खिलवाड़ करते इस मौजूदा नियम पर भी सरकार और न्यायपालिका को संज्ञान लेना चाहिए। मौजूदा मुस्लिम पर्सनल लॉ पर विचार करने और इसे समाप्त करने की आवश्यकता है वरना मुस्लिम औरतें यूं ही तकलीफदेह परिस्थितियों से गुजरती रहेंगी।