गांवों में आज भी बची है पारंपरिक होली की पहचान

नवभारत टाइम्स

फरीदाबाद के कुछ गांवों में आज भी होली की पारंपरिक पहचान जीवित है। यहां हरियाणा की कोड़ामार और बृज की लठमार होली का संगम देखने को मिलता है। गुर्जर समाज के गांवों में नगाड़ा बजाने की प्रतियोगिता होती है। जाट समाज के लोग अब फूलों से होली खेलते हैं। यह परंपराएं आज भी निभाई जा रही हैं।

traditional holi identity still alive in villages a confluence of kodamar lathmar and nagada competition
हरियाणा के फरीदाबाद में होली का त्योहार अनोखे अंदाज में मनाया जा रहा है। यहां ग्रामीण इलाकों में हरियाणा की कोड़ामार और बृज की लठमार होली का संगम देखने को मिलता है। इस परंपरा में गांव की भाभीं अपने देवरों को कपड़े के कोड़े और लठ से मारती हैं, जबकि देवर उन पर रंग डालते हैं। यह हंसी-ठिठोली से भरा त्योहार शाम को मंदिर में पूजा और प्रसाद वितरण के साथ पूरा होता है। बच्चे और बुजुर्ग नगाड़े, चीमटा, झांझ और मंजीरा बजाकर उत्सव में चार चांद लगाते हैं। गुर्जर समाज के कई गांव आज भी इस अनूठी परंपरा को संजोए हुए हैं।

गुर्जर समाज में होली के दिन नगाड़ा बजाने की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। पाली, मोहब्बताबाद, पाखल, अनखीर, नंगला और आसपास के गांवों में होली और धुलेंडी पर नगाड़े बजाने का मुकाबला होता है। इस प्रतियोगिता में जिस मोहल्ले का नगाड़ा सबसे लंबे समय तक बजता है, उसे 'बेस्ट नगाड़ा' माना जाता है। मनोज भड़ाना, जो गुर्जर समाज से हैं, बताते हैं कि गांवों के मोहल्लों में अलग-अलग नगाड़े होते हैं। सबसे सुंदर सजे हुए और प्रतियोगिता में लंबे समय तक बजने वाले नगाड़े को होली पर पुरस्कार मिलता है। इसके लिए लोग अपने मोहल्ले के घरों से मक्खन और पैसे इकट्ठा करते हैं ताकि नगाड़े को अच्छे से सजा सकें। गांव में होली पर नगाड़ा बजाकर और होली गायन करके जश्न मनाया जाता है। यह परंपरा कई सालों से चली आ रही है। उनके बुजुर्ग भी इसी तरह होली मनाते थे, जिसमें पुरुष नगाड़ा बजाते थे और महिलाएं होली के गीत गाकर नगाड़ा देखने आती थीं। आज भी इस परंपरा को जिंदा रखा गया है। होली आते ही गांव में तैयारियां शुरू हो जाती हैं। रोजाना रात को होली गायन और नगाड़ा बजाने का अभ्यास किया जाता है। बच्चे नगाड़ा बजाने के लिए अच्छी और मजबूत लकड़ी का डंका बनवाते हैं। रात में होली गायन होता है, जिसमें बुजुर्गों के साथ युवा पीढ़ी भी शामिल होती है। होली गायन में प्रह्लाद की कथा गाई जाती है। इसके बाद तुकबंदी भी होती है।
वहीं, जाट समाज की होली में समय के साथ बदलाव आया है। रामरतन नर्वत, जो जाट समाज से हैं, बताते हैं कि पहले होली प्यार और खुशी का संगम होती थी। पहले लोग दोस्तों को पोखर में गिरा देते थे, कीचड़ में धकेल देते थे और एक-दूसरे के चेहरे को रंगों से रंग देते थे। लेकिन अब रंगों की जगह फूलों ने ले ली है। लोग फूलों से होली खेलते हैं और एक-दूसरे को टीका लगाकर शुभकामनाएं देते हैं। होलिका दहन पर महिलाएं अपने घरों से पूजन का सामान और गोबर के उपले (कंड़े) लाकर दहन वाली जगह पर इकट्ठा करती हैं और पूजा करती हैं। इसके बाद शाम को होलिका जलाई जाती है। रामरतन नर्वत कहते हैं कि अब होली केवल फूलों और चंदन के टीके तक सीमित रह गई है। लोगों ने रंगों से दूरी बना ली है। पहले रंग लगाने पर कोई बुरा नहीं मानता था, बल्कि इसे खुशी और शुभ का प्रतीक माना जाता था। होली आने से एक महीने पहले ही तैयारियां शुरू हो जाती थीं। घरों में पकवान बनने लगते थे। दोस्तों को पानी से भिगोना या कीचड़ में धक्का देना, ऐसी ही हंसी-ठिठोली के साथ पूरा त्योहार मनाया जाता था। वे दिन आज भी बहुत याद आते हैं, काश वो दिन दोबारा लौट आए। जब त्योहार एक-दूसरे के साथ हंसी मजाक करने में ही निकल जाता था और कोई बुरा भी नहीं मानता था।

इस तरह, फरीदाबाद के ग्रामीण इलाकों में होली का त्योहार अपनी पुरानी परंपराओं और नए बदलावों के साथ मनाया जा रहा है। गुर्जर समाज अपनी नगाड़ा प्रतियोगिताओं और होली गायन से इस उत्सव को जीवंत रखे हुए है, जबकि जाट समाज में अब फूलों और चंदन के टीके से होली खेलने का चलन बढ़ गया है। दोनों ही समाज अपनी-अपनी तरह से इस रंगीन त्योहार का आनंद ले रहे हैं, लेकिन पुरानी यादें और परंपराएं आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं। यह संगम दिखाता है कि कैसे समय के साथ त्योहारों में बदलाव आते हैं, लेकिन उनकी मूल भावना, यानी खुशी और मेलजोल, हमेशा बनी रहती है। होली का यह अनूठा रूप ग्रामीण भारत की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है, जहां हर क्षेत्र की अपनी एक खास पहचान है। यह परंपराएं न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि सामाजिक जुड़ाव और पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान के हस्तांतरण का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। गुर्जर समाज के युवा आज भी नगाड़ा बजाना सीख रहे हैं और होली गायन में हिस्सा ले रहे हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि वे अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। वहीं, जाट समाज में फूलों से होली खेलना एक नई परंपरा का रूप ले रहा है, जो पर्यावरण के प्रति जागरूकता को भी दर्शाता है। यह बदलाव दिखाता है कि त्योहार समय के साथ बदलते हैं, लेकिन उनका सार वही रहता है - खुशियां बांटना और अपनों के साथ समय बिताना। होली का यह संगम फरीदाबाद के ग्रामीण इलाकों को एक खास पहचान देता है, जहां परंपराएं और आधुनिकता का एक सुंदर मिश्रण देखने को मिलता है।