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नीतीश राज्यसभा के लिए क्यों तैयार
नवभारत टाइम्स•
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला किया है। यह निर्णय राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। भाजपा की रणनीति और बेटे निशांत के भविष्य को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं। बिहार में नए मुख्यमंत्री के चेहरे पर भी मंथन जारी है।
बिहार की राजनीति में इन दिनों भूचाल आया हुआ है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अचानक 20 साल की सीएम की कुर्सी छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला लिया है। इस फैसले ने सबको चौंका दिया है। कहा जा रहा है कि यह सब बीजेपी के 'ऑपरेशन लोटस' का नतीजा है, जिसके तहत बीजेपी बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती है। नीतीश के इस कदम के पीछे कई सियासी वजहें बताई जा रही हैं, जिनमें बीजेपी का दबाव और अपने बेटे निशांत के राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करना शामिल है।
रणभूमि हो या राजनीति, जीत हमेशा सही रणनीति से ही मिलती है। इतिहास गवाह है कि सिर्फ ताकत काम नहीं आती, बल्कि सही समय पर बनाई गई सटीक योजना ही जीत दिलाती है। अभी दुनिया में अमेरिका-इस्राइल का ईरान के खिलाफ 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' चल रहा है, तो वहीं बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ 'ऑपरेशन लोटस' सफल होता दिख रहा है। इस 'ऑपरेशन लोटस' में अक्सर विरोधी खेमा भी शामिल हो जाता है। बिहार में भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा। जनता दल (यूनाइटेड) (JDU) के कुछ सांसदों को बीजेपी ने मोहरा बनाया। बीजेपी चाहती थी कि इस बार मुख्यमंत्री उनकी पार्टी से बने। अब शायद उनका यह सपना पूरा होने वाला है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि नीतीश ने मुख्यमंत्री का पद छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला किया। जिस कुर्सी पर वे 20 सालों से थे, उसे अचानक छोड़ने की इच्छा क्यों हुई? सवाल यह भी है कि उनकी यह ख्वाहिश राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति चुनाव के दौरान क्यों नहीं हुई? अब पटना छोड़कर दिल्ली जाना क्यों? इसके पीछे क्या कारण है? सियासी गलियारों में कई बातें हो रही हैं। क्या यह बीजेपी का दबाव है या अपने बेटे निशांत के राजनीतिक भविष्य के लिए खुद नीतीश ऐसा कर रहे हैं? उनके बारे में तो कोई ऐसा सोच भी नहीं सकता था। मगर कई बार हमारी जिंदगी में ऐसे हालात आते हैं जब सिद्धांत और उसूल त्यागने पड़ते हैं। इस बार नीतीश का रुख भी कुछ यही बता रहा है।यह तो होना ही था। हाल के दिनों में नीतीश की अजीब हरकतों से पार्टी, सरकार और सहयोगी बीजेपी परेशान रही। विधानसभा, चुनावी सभा या सरकारी कार्यक्रम में उनकी हरकतें प्रदेश और देश में चर्चा का विषय बन गईं। पिछले दो साल में नीतीश कुमार ने न मीडिया में इंटरव्यू दिया और न ही कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस की। शायद इसलिए उन्होंने सीएम पद छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला लिया।
देश के 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार है, जिनमें 14 राज्यों में बीजेपी के मुख्यमंत्री हैं। पार्टी हमेशा अधिक सीटों वाले राज्यों में अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती है। महाराष्ट्र का उदाहरण देखिए। वहां बीजेपी और शिवसेना गठबंधन में थीं, लेकिन उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। बीजेपी ने मना किया, तो उद्धव ने कांग्रेस और NCP के साथ सरकार बनाई। बाद में बीजेपी ने शिवसेना को तोड़कर एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाया। बिहार में भी बीजेपी की नजर लगातार मुख्यमंत्री पद पर रही। 2020 में नीतीश की पार्टी तीसरे नंबर पर थी, फिर भी बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया।
भले ही पिछले विधानसभा चुनाव में NDA की जीत के बाद नीतीश सीएम बने। मगर, बीजेपी ने गृहमंत्री का पद ले लिया। अब उनकी प्राथमिकता स्वास्थ्य और बेटे निशांत के भविष्य की लग रही है। लग रहा है कि नीतीश बीजेपी की शरण में चले गए हैं। राज्यसभा का सदस्य बनने के बाद संभावना है कि उन्हें पीएम मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल किया जाए। यह पहली बार होगा जब नीतीश पीएम मोदी के नेतृत्व में काम करेंगे। मगर, सवाल है कि मुख्यमंत्री बनने के तीन महीने में ही राज्यसभा जाने की इच्छा क्यों हुई?
नीतीश नफा-नुकसान दोनों को बखूबी भांप लेते हैं। वहीं बीजेपी की रणनीति संयमित और दीर्घकालिक होती है। JDU में फिलहाल कोई मजबूत मुख्यमंत्री उम्मीदवार नहीं है और निशांत भी बिना विधान परिषद या विधानसभा सदस्य बने सीएम नहीं बन सकते। राजीव गांधी, हेमंत सोरेन और राबड़ी देवी जैसे कई उदाहरण हैं, जो इतिहास में राजनीति में अप्रत्याशित रहे हैं। अब कयास हैं कि बीजेपी पिछड़ा वर्ग से सीएम चेहरा पेश कर सकती है। इनमें सम्राट चौधरी, दिलीप जायसवाल और नित्यानंद राय का नाम है। हालांकि, फैसला पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को ही करना है।
नीतीश ने 20 साल तक बिना बहुमत मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी चाणक्य नीति दिखाई। उनके दिल्ली जाने के फैसले और विधान परिषद छोड़ने के बाद बेटे निशांत के संभावित डिप्टी सीएम बनने के कयास हैं। हालांकि आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। नीतीश हमेशा पार्टी और कार्यकर्ताओं का संतुलन रखते हैं। अब निशांत की भूमिका और सरकार में उनका पद क्या रहता है, यह देखना दिलचस्प होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार का यह कदम सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। वे खुद को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करना चाहते हैं, जहां उनकी भूमिका पीएम मोदी के मंत्रिमंडल में एक महत्वपूर्ण मंत्री की हो सकती है। यह उन्हें बिहार की राजनीति की रोजमर्रा की उठापटक से भी दूर रखेगा। साथ ही, वे अपने बेटे निशांत के लिए बिहार में एक मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं। निशांत को डिप्टी सीएम बनाकर वे उन्हें भविष्य के लिए तैयार कर सकते हैं।
बीजेपी की रणनीति भी साफ दिख रही है। बिहार में सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत करना और मुख्यमंत्री पद पर काबिज होना उनका मुख्य लक्ष्य है। 'ऑपरेशन लोटस' के जरिए वे यह लक्ष्य हासिल करने के करीब दिख रहे हैं। महाराष्ट्र की तरह, जहां उन्होंने शिवसेना को तोड़कर अपना मुख्यमंत्री बनाया, बिहार में भी वे इसी तरह की रणनीति अपना सकते हैं। हालांकि, JDU के कुछ विधायकों के टूटने की खबर अभी पुष्ट नहीं हुई है, लेकिन सियासी गलियारों में चर्चाएं तेज हैं।
नीतीश कुमार का यह फैसला कई मायनों में अहम है। यह बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकता है। बीजेपी के लिए यह एक बड़ी जीत होगी, वहीं JDU के लिए यह एक चुनौती होगी कि वे इस स्थिति से कैसे निपटते हैं। निशांत की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। क्या वे अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा पाएंगे? यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति किस दिशा में मोड़ लेती है।
यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि राजनीति में कब क्या हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। जो कल तक सत्ता में थे, आज वे सत्ता से दूर जाने की बात कर रहे हैं। यह सब खेल है दांव-पेंच का, जहां हर कोई अपनी चाल चल रहा है। नीतीश कुमार ने भी अपनी एक नई चाल चली है, जिसका नतीजा क्या होगा, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीति में आने वाले दिन बहुत रोमांचक होने वाले हैं।