खाद्य संकट का डर

नवभारत टाइम्स

पश्चिम एशिया में जारी तनाव से तेल और गैस के साथ-साथ उर्वरक आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाले निर्यात में बाधा से दुनिया भर में उर्वरक की कमी हो गई है। इससे खाद्य उत्पादन पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है।

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पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो रही है, जिसका असर बाज़ार पर दिखने लगा है। लेकिन, इसके साथ ही एक और बड़ा संकट गहरा रहा है - उर्वरक आपूर्ति में कमी। अगर यह समस्या लंबे समय तक बनी रही, तो दुनिया को खाद्य असुरक्षा और महंगाई का सामना करना पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य , जहाँ से दुनिया का 35% यूरिया और 45% सल्फर निर्यात होता है, पर ईरान की पहरेदारी के चलते जहाजों का आना-जाना बंद है। इससे सप्लाई चेन टूट रही है और दुनिया की करीब आधी अनाज पैदावार पर खतरा मंडरा रहा है।

यह स्थिति करीब 4 साल पहले यूक्रेन और रूस युद्ध के समय बनी स्थिति से भी गंभीर है। तब गेहूं की आपूर्ति में कमी और उर्वरकों की कीमतों में भारी उछाल आया था। यूक्रेन और रूस मिलकर दुनिया का करीब 30% गेहूं निर्यात करते हैं, जिस पर अचानक रोक लग गई थी। हालांकि, तब रूस से दोनों चीजों का निर्यात जल्द ही फिर से शुरू हो गया था और भारत जैसे देशों ने गेहूं निर्यात बढ़ा दिया था। लेकिन, इस बार सीधे समुद्री मार्ग बाधित होने से हालात बिल्कुल अलग हैं।
ईरान द्वारा दूसरे अरब देशों में मौजूद उर्वरक उत्पादन इकाइयों को निशाना बनाने से भी असर पड़ा है। कतर एनर्जी, जो समुद्र के रास्ते होने वाले यूरिया व्यापार का लगभग 10% हिस्सा रखती है, के एक कॉम्प्लेक्स पर ड्रोन हमला हुआ। इसके बाद कंपनी ने सल्फर, अमोनिया और यूरिया का उत्पादन रोक दिया है। ईरान और सऊदी अरब की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है।

उर्वरक बाज़ार हमेशा से बहुत संवेदनशील रहा है। चीन जैसे देश अपनी ज़रूरतों के हिसाब से वैश्विक आपूर्ति को प्रभावित करते हैं। प्राकृतिक गैस भी एक बड़ा कारक है, जिसकी ज़रूरत उर्वरक उत्पादन में पड़ती है और जिसकी आपूर्ति में कमी आई है।

भारत के लिए यह स्थिति और भी गंभीर है। पिछले साल अप्रैल से नवंबर के बीच भारत ने रिकॉर्ड 70 लाख टन यूरिया आयात किया था। देश अपनी ज़रूरत का करीब 40% उर्वरक पश्चिम एशिया से मंगाता है। अगर किसानों को समय पर उर्वरक नहीं मिले, तो इसका असर पहली फसल पर ही दिखने लगेगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि उत्पादन 50% तक कम हो सकता है, जिसके नतीजे यूक्रेन युद्ध से भी ज़्यादा भयावह होंगे।

होर्मुज जलडमरूमध्य पश्चिम एशिया का एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। यह दुनिया के लिए तेल, गैस और उर्वरकों के व्यापार का एक प्रमुख रास्ता है। ईरान और अन्य देशों के बीच तनाव के कारण इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही बाधित हो गई है। इससे न केवल ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ रहा है, बल्कि उर्वरक की कमी भी एक बड़ी चिंता का विषय बन गई है। यूरिया दुनिया में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला उर्वरक है। यह फसलों की पैदावार बढ़ाने में मदद करता है। दुनिया का लगभग आधा अनाज यूरिया की मदद से ही पैदा होता है।

जब होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों का आना-जाना बंद हो जाता है, तो उर्वरक की आपूर्ति बाधित हो जाती है। इससे किसानों को समय पर यूरिया नहीं मिल पाता। जब किसानों को पर्याप्त मात्रा में उर्वरक नहीं मिलते, तो वे अपनी फसलों की पैदावार नहीं बढ़ा पाते। इससे अनाज का उत्पादन कम हो जाता है। अनाज की कमी होने पर उसकी कीमतें बढ़ जाती हैं। यही स्थिति खाद्य असुरक्षा और महंगाई को जन्म देती है।

यह समस्या सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा है। अगर वैश्विक स्तर पर उर्वरक की आपूर्ति बाधित होती है, तो दुनिया भर में अनाज का उत्पादन कम हो जाएगा। इससे भुखमरी और गरीबी बढ़ सकती है। सरकारों को इस समस्या से निपटने के लिए तुरंत कदम उठाने होंगे। वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों की तलाश करनी होगी और उर्वरक उत्पादन को बढ़ावा देना होगा।

यह स्थिति हमें याद दिलाती है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला कितनी नाजुक है। एक छोटे से क्षेत्र में होने वाला तनाव भी पूरी दुनिया को प्रभावित कर सकता है। हमें शांति और स्थिरता बनाए रखने के लिए मिलकर काम करना होगा, ताकि ऐसी समस्याओं से बचा जा सके।