सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से इच्छामृत्यु पर जल्द कानून बनाने को कहा

नवभारत टाइम्स

सुप्रीम कोर्ट ने भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर एक स्पष्ट कानून बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है। अदालत ने कहा कि कानून न होने के कारण उन्हें दिशानिर्देश जारी करने पड़ रहे हैं। 2018 के फैसले के 8 साल बाद भी कानून न बनना चिंताजनक है।

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु ( Passive Euthanasia ) के मामले में एक स्पष्ट कानून बनाने की सख्त जरूरत बताई है। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर कानून न होने की वजह से उन्हें बार-बार संवैधानिक जरूरत के तहत दिशा-निर्देश जारी करने पड़ रहे हैं। यह टिप्पणी जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने 32 वर्षीय हरीश राणा की याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि 2018 के एक फैसले के 8 साल बाद भी इस संवेदनशील मुद्दे पर कोई कानून नहीं बना है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि वह इस विषय पर एक विस्तृत कानून बनाए। ऐसा कानून बनाने से जीवन के अंतिम पड़ाव की देखभाल ( end-of-life care ) जैसे जटिल मामलों में लोगों को स्पष्टता और कानूनी सुरक्षा मिल सकेगी।
अदालत ने याद दिलाया कि इस मुद्दे पर सबसे पहले लॉ कमीशन ऑफ इंडिया ने 2006 में अपनी 196वीं रिपोर्ट में गहराई से विचार किया था। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि अगर किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज के हित में जीवन बचाने वाले इलाज को रोका जाता है, तो इसे आत्महत्या की कोशिश नहीं माना जाएगा।

इससे पहले, कॉमन कॉज नाम के एक एनजीओ ने अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित करने की मांग की थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा शानबाग बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में भी इच्छामृत्यु पर विचार किया था। उस समय अदालत ने अरुणा के लिए सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) की अनुमति तो नहीं दी, लेकिन निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) के लिए कुछ अंतरिम दिशा-निर्देश जारी किए थे।

कोर्ट ने कहा कि विधायी खालीपन ( legislative vacuum ) यानी कानून की कमी के कारण उन्हें बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ता है। यह स्थिति चिंताजनक है। इसलिए, एक समग्र कानून (comprehensive legislation) की तत्काल आवश्यकता है। यह कानून उन लोगों को राहत देगा जो गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं और गरिमा के साथ अपने जीवन का अंत करना चाहते हैं।

यह कानून जीवन के अंतिम क्षणों में मरीजों और उनके परिवारों के लिए एक स्पष्ट रास्ता दिखाएगा। इससे डॉक्टरों और अस्पतालों को भी सही दिशा-निर्देश मिलेंगे कि ऐसे नाजुक मामलों में क्या कदम उठाए जाने चाहिए। कोर्ट की यह टिप्पणी इस बात पर जोर देती है कि समाज को ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर आगे बढ़कर कानून बनाने की जरूरत है।