कविता का सम्मान

नवभारत टाइम्स

गुजराती साहित्य के महान कवि नानालाल दलपतराम कवि का जीवन प्रेरणादायक है। उन्होंने अपनी कविताओं से सत्य और सौंदर्य को व्यक्त किया। एक बार दरबार में राजा की प्रशंसा में कविता सुनाने के अनुरोध पर उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि कविता केवल प्रसन्न करने के लिए नहीं होती।

nanalal dalpatram kavi an example of truth and self respect a great poet of gujarati literature
गुजराती साहित्य के महान कवि नानालाल दलपतराम का जन्म 16 मार्च 1877 को अहमदाबाद में हुआ था। वे अपनी प्रसिद्ध रचना ‘ वसंतोत्सव ’ के लिए जाने जाते हैं, जिसमें प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य का सुंदर वर्णन है। उन्होंने कालिदास की ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ और ‘मेघदूत’ का गुजराती में अनुवाद किया, साथ ही भगवद्गीता और उपनिषदों को भी आम लोगों तक पहुंचाया। एक बार बड़ौदा रियासत के दरबार में उनसे राजा की तारीफ में कविता सुनाने को कहा गया, लेकिन नानालाल ने विनम्रता से कहा कि कविता सिर्फ खुश करने के लिए नहीं, बल्कि सच और सुंदरता बताने के लिए होती है। उनकी यह बात सच्ची प्रतिभा का उदाहरण है, जो सच और स्वाभिमान के साथ खड़ी रहती है।

नानालाल दलपतराम कवि का नाम गुजराती साहित्य में बहुत इज्जत से लिया जाता है। उनका जन्म अहमदाबाद में 16 मार्च 1877 को हुआ था। उनकी एक बहुत मशहूर कविता है ‘वसंतोत्सव’। इस कविता में उन्होंने प्रकृति, प्यार और खूबसूरती को बहुत प्यारे तरीके से दिखाया है।
नानालाल ने संस्कृत के बड़े कवि कालिदास की दो मशहूर रचनाओं, ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ और ‘मेघदूत’ का गुजराती भाषा में अनुवाद किया। इतना ही नहीं, उन्होंने भगवद्गीता और कई उपनिषदों को भी गुजराती लोगों के लिए आसान बनाया ताकि वे उन्हें पढ़ सकें और समझ सकें।

एक बार की बात है, उन्हें बड़ौदा स्टेट की गायकवाड़ रियासत के दरबार में बुलाया गया। वहां राजा ने उनसे कहा कि वे राजा की तारीफ में कोई कविता सुनाएं। उस समय यह एक आम बात हुआ करती थी कि दरबारी कवि राजा की तारीफ में कविताएं सुनाते थे।

लेकिन नानालाल ने बड़े ही नम्रता से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कविता का काम सिर्फ किसी को खुश करना नहीं है। कविता तो सच और सुंदरता को व्यक्त करने का जरिया है। अगर कोई कवि सिर्फ तारीफ पाने के लिए लिखता है, तो उसकी रचना का महत्व कम हो जाता है।

नानालाल की यह बात सुनकर दरबार में कुछ पल के लिए एकदम सन्नाटा छा गया। यह किस्सा हमें यह सिखाता है कि असली हुनर वही है जो सच का साथ दे और अपने स्वाभिमान पर खड़ा रहे। यह घटना सच्ची प्रतिभा की पहचान कराती है।