सूरत: नासिरनगर में 100 से अधिक घरों के विध्वंस पर 5 सिविल इंजीनियर निलंबित, हाई कोर्ट की जांच जारी
सूरत: नासिरनगर में 100 से अधिक घरों के विध्वंस पर 5 सिविल इंजीनियर निलंबित, हाई कोर्ट की जांच जारी
NewsPoint•
सूरत नगर निगम (एसएमसी) ने नासिरनगर में 100 से अधिक घरों के विवादास्पद विध्वंस के मामले में पांच सिविल इंजीनियरिंग अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। यह कार्रवाई गुजरात हाई कोर्ट द्वारा इस घटना की गहन जांच के आदेश के बाद की गई है। एसएमसी ने एक विशेष जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर यह कदम उठाया है, क्योंकि प्रभावित निवासियों ने विध्वंस को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। निलंबन का उद्देश्य विभागीय जांच को 'निष्पक्ष, तटस्थ और पारदर्शी' तरीके से सुनिश्चित करना है। निलंबित अधिकारियों में कार्यकारी अभियंता सुजलकुमार प्रजापति और जयंग जीवनरामजीवाला, उप अभियंता अर्पण परमार, सहायक अभियंता मोनिका गधिया और कनिष्ठ अभियंता नरेशकुमार गलचर शामिल हैं। यह पूरा मामला 30 मई को सूरत के केंद्रीय क्षेत्र के नासिरनगर में चलाए गए विध्वंस अभियान से जुड़ा है, जहाँ निवासियों का आरोप है कि लगभग 106 घरों को बिना किसी पूर्व सूचना या उचित प्रक्रिया के गिरा दिया गया। इस घटना ने राजनीतिक हलचल मचा दी है और न्यायिक जांच का रास्ता खोल दिया है, जिसके चलते कई प्रभावित लोगों ने गुजरात हाई कोर्ट में याचिकाएं दायर की हैं।
इस जांच में खास तौर पर कार्यकारी अभियंता जयंग जीवनरामजीवाला पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जो उस समय क्षेत्रीय अधिकारी के तौर पर विध्वंस की देखरेख कर रहे थे। विध्वंस के दौरान उनके सिर पर रुमाल बांधकर अभियान की निगरानी करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुए थे। खबरों के मुताबिक, सार्वजनिक आलोचना बढ़ने पर उन्होंने 8 जून से एक हफ्ते की छुट्टी ले ली थी। कार्यकारी अभियंता सुजलकुमार प्रजापति की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि विध्वंस स्थल उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था, फिर भी उन पर आरोप है कि उन्होंने इस काम के लिए तीन पोक्लेन (मिट्टी खोदने वाली मशीनें), दो जेसीबी (तोड़फोड़ करने वाली मशीनें) और करीब 60 मजदूरों की तैनाती का आदेश दिया था। उन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने पुलिस की मौजूदगी में विध्वंस कराने का निर्देश दिया था, जबकि उनके अपने विभाग का कोई भी अधिकारी विध्वंस दल के साथ नहीं था। ये सभी आरोप चल रही जांच का हिस्सा हैं।29 जून को हुई हाई कोर्ट की ताजा सुनवाई में, अदालत ने सूरत पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलोत से पूछा कि विध्वंस के दौरान पुलिस की मौजूदगी के बावजूद प्रशासन ने 16 दिनों तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। अदालत ने सीमांकन (जमीन की हदबंदी) प्रक्रिया में एक पुलिस उपायुक्त सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए और इस मामले में नामित निजी बिल्डर को नोटिस जारी किया। रिपोर्ट्स के अनुसार, हाई कोर्ट ने कहा कि तोड़फोड़ सड़क सीमांकन की आड़ में की गई लगती है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अगर यह कार्रवाई गैरकानूनी थी, तो मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों का कर्तव्य था कि वे इसे रोकें। अदालत ने एसएमसी को अपनी आंतरिक जांच रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। साथ ही, इस आरोप की भी जांच करने को कहा है कि तोड़फोड़ किसी निजी विकास परियोजना को फायदा पहुंचाने के लिए की गई हो सकती है। ये आरोप अभी भी अदालत में विचाराधीन हैं और साबित नहीं हुए हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 2 जुलाई को होनी है।
एसएमसी ने यह निलंबन इसलिए किया है ताकि विभागीय जांच बिना किसी दबाव के, निष्पक्ष और पूरी तरह से पारदर्शी तरीके से हो सके। यह कदम निवासियों के विरोध और हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उठाया गया है। निवासियों का कहना है कि उन्हें विध्वंस से पहले कोई सूचना नहीं दी गई थी और न ही कोई उचित प्रक्रिया का पालन किया गया। यह घटना सूरत के नासिरनगर इलाके में हुई, जो शहर का एक केंद्रीय हिस्सा है। 30 मई को जब यह विध्वंस अभियान चलाया गया, तब कई लोगों के सिर से छत छिन गई।
इस पूरे मामले में जयंग जीवनरामजीवाला की भूमिका सबसे ज्यादा चर्चा में है। वह उस समय विध्वंस की कमान संभाले हुए थे। सोशल मीडिया पर उनका एक वीडियो काफी वायरल हुआ था, जिसमें वह सिर पर रुमाल बांधकर विध्वंस का जायजा लेते दिख रहे थे। लोगों ने इस पर काफी सवाल उठाए थे। सार्वजनिक रूप से आलोचना होने के बाद, उन्होंने 8 जून से एक हफ्ते की छुट्टी ले ली थी।
वहीं, कार्यकारी अभियंता सुजलकुमार प्रजापति पर भी गंभीर आरोप लगे हैं। हालांकि विध्वंस वाली जगह उनके सीधे अधिकार क्षेत्र में नहीं आती थी, फिर भी उन पर आरोप है कि उन्होंने इस काम के लिए तीन पोक्लेन मशीनें, दो जेसीबी मशीनें और लगभग 60 मजदूरों को जुटाने का आदेश दिया था। इससे भी बड़ी बात यह है कि उन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने पुलिस की मौजूदगी में विध्वंस कराने का निर्देश दिया था, जबकि उनके अपने विभाग का कोई भी अधिकारी मौके पर मौजूद नहीं था। यह सब बातें जांच का हिस्सा हैं।
हाई कोर्ट इस मामले को बहुत गंभीरता से ले रहा है। 29 जून को हुई सुनवाई में, अदालत ने सूरत के पुलिस कमिश्नर से सीधा सवाल पूछा कि जब पुलिस मौके पर मौजूद थी, तो फिर 16 दिनों तक प्रशासन ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की। अदालत ने सीमांकन प्रक्रिया में शामिल वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, जिनमें एक पुलिस उपायुक्त भी शामिल थे, की भूमिका पर भी सवाल उठाए। इतना ही नहीं, इस मामले में जिस निजी बिल्डर का नाम सामने आया है, उसे भी अदालत ने नोटिस भेजा है।
हाई कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि यह तोड़फोड़ सड़क की हदबंदी के बहाने की गई लगती है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अगर यह कार्रवाई गैरकानूनी थी, तो पुलिस का यह फर्ज था कि वे इसे रोकते। अदालत ने एसएमसी को अपनी आंतरिक जांच रिपोर्ट जमा करने का आदेश दिया है। साथ ही, इस आरोप की भी जांच करने को कहा है कि कहीं यह तोड़फोड़ किसी निजी विकास परियोजना को फायदा पहुंचाने के लिए तो नहीं की गई थी। ये आरोप अभी भी अदालत में विचाराधीन हैं और इन्हें साबित किया जाना बाकी है। इस मामले की अगली सुनवाई 2 जुलाई को तय की गई है, जहाँ उम्मीद है कि कुछ और अहम खुलासे होंगे।