वैज्ञानिकों ने इन्फ्लुएंजा वायरस के मानव कोशिकाओं में फैलने के तरीके का किया खुलासा, नई दवाओं की राह खुली

NewsPoint
Navbharat Times
नई दिल्ली, 21 जुलाई (आईएएनएस)। वैज्ञानिकों ने फ्लू वायरस के इंसानी कोशिकाओं में फैलने और उन्हें नियंत्रित करने के तरीके को समझने में एक बड़ी सफलता हासिल की है। यूरोपियन मॉलेक्यूलर बायोलॉजी लेबोरेटरी (ईएमबीएल) हैम्बर्ग और लाइबनिज रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर मॉलेक्यूलर फार्माकोलॉजी (एफएमपी) के शोधकर्ताओं ने पहली बार यह पता लगाया है कि फ्लू वायरस, खासकर इन्फ्लुएंजा ए, संक्रमित कोशिकाओं के अंदर मौजूद प्रोटीनों से कैसे जुड़ता है और अपनी जरूरत के हिसाब से उनका इस्तेमाल कैसे करता है। यह महत्वपूर्ण शोध जर्नल नेचर माइक्रोबायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है, जो भविष्य में फ्लू के इलाज के लिए नई दवाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

दुनिया भर में हर साल लाखों लोग फ्लू की चपेट में आते हैं और कई की मौत भी हो जाती है। इन्फ्लुएंजा ए वायरस तो कई बार बड़ी महामारियों का कारण भी बन चुका है। ऐसे में, यह समझना कि यह वायरस हमारे शरीर की कोशिकाओं के अंदर क्या करता है, बहुत जरूरी है। अब तक वैज्ञानिक जब वायरस और कोशिकाओं के बीच होने वाली गतिविधियों का अध्ययन करते थे, तो उन्हें कोशिकाओं को तोड़ना पड़ता था। इस तरीके में एक बड़ी समस्या थी। कोशिका टूटने के बाद कई ऐसे संपर्क दिखाई दे सकते थे जो असल में शरीर के अंदर कभी हुए ही नहीं थे। वहीं, कुछ जरूरी और कमजोर संपर्क नष्ट हो जाते थे, जिससे पूरी तस्वीर साफ नहीं हो पाती थी।
इस समस्या को दूर करने के लिए, वैज्ञानिकों ने एक आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया, जिसे क्रॉस-लिंकिंग मास स्पेक्ट्रोमेट्री (एक्सएल-एमएस) कहते हैं। इस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि यह संक्रमित कोशिका को तोड़े बिना ही यह बता सकती है कि कौन सा प्रोटीन किसके संपर्क में है। ईएमबीएल हैम्बर्ग के वैज्ञानिकों ने बताया कि इस तरीके से पहली बार फ्लू वायरस और इंसानी कोशिकाओं के बीच होने वाले सीधे संपर्कों को उसी स्थिति में देखा गया, जैसी स्थिति संक्रमण के दौरान शरीर के अंदर होती है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी कमरे को तोड़े बिना ही यह जान लें कि अंदर कौन सी चीजें एक-दूसरे के पास रखी हैं।

शोधकर्ताओं ने इसके बाद कंप्यूटर मॉडलिंग की मदद से यह भी समझने की कोशिश की कि वायरस और इंसानी प्रोटीन संरचनात्मक रूप से किस प्रकार एक-दूसरे के साथ जुड़ते हैं। इसके लिए उन्होंने अल्फाफोल्ड तकनीक के एक विशेष रूप का इस्तेमाल किया। यह वही तकनीक है जो प्रोटीन की संरचना को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यह तकनीक हमें यह समझने में मदद करती है कि प्रोटीन का आकार कैसा है और वह कैसे काम करता है।

इस अध्ययन में दो बहुत ही महत्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आए हैं। पहला निष्कर्ष वायरस के एक प्रमुख प्रोटीन, हीमैग्लूटिनिन (hemagglutinin) से जुड़ा है। यह प्रोटीन वायरस को मानव कोशिकाओं से जुड़ने और उनके अंदर प्रवेश करने में मदद करता है। शोध में पाया गया कि मानव कोशिकाओं के कुछ प्रोटीन हीमैग्लूटिनिन को सही ढंग से तैयार होने और उसकी संरचना विकसित करने में सहायता करते हैं। इनमें से कुछ प्रोटीनों की भूमिका के बारे में पहले बहुत कम जानकारी थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में फ्लू के इलाज के लिए नई एंटी-वायरल दवाएं विकसित करने में बहुत मददगार साबित हो सकती है। यानी, हम ऐसी दवाएं बना सकते हैं जो इन प्रोटीनों को हीमैग्लूटिनिन को बनाने से रोकें, जिससे वायरस कोशिकाओं में प्रवेश ही न कर पाए।

दूसरा महत्वपूर्ण निष्कर्ष कोशिका के केंद्र, जिसे न्यूक्लियस (nucleus) कहते हैं, में मौजूद पैरास्पेक्ल्स (paraspeckles) नामक संरचनाओं से जुड़ा है। अध्ययन में पाया गया कि इन्फ्लुएंजा ए वायरस संक्रमण के दौरान इन पैरास्पेक्ल्स को तोड़ देता है। पैरास्पेक्ल्स कोशिका के न्यूक्लियस में मौजूद ऐसे ढांचे होते हैं जो कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में भूमिका निभाते हैं। इनमें आरएनए (RNA) से जुड़े प्रोटीन मौजूद होते हैं। जब वायरस इन पैरास्पेक्ल्स को तोड़ता है, तो अंदर मौजूद प्रोटीन बाहर निकल जाते हैं। वायरस फिर इन प्रोटीनों का इस्तेमाल अपनी संख्या बढ़ाने के लिए कर सकता है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि पैरास्पेक्ल्स को खत्म करने से वायरस को दोहरा फायदा मिलता है। एक तरफ उसे अपनी बढ़ोतरी के लिए जरूरी संसाधन मिल जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ कोशिका की वायरस से लड़ने वाली प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली कमजोर हो सकती है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई चोर घर में घुसकर पहले अलमारी तोड़ दे, जिससे उसे कीमती सामान मिल जाए और साथ ही घर की सुरक्षा व्यवस्था भी कमजोर हो जाए।

यह शोध सिर्फ फ्लू वायरस तक ही सीमित नहीं रहेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तरीका भविष्य में दूसरे खतरनाक वायरसों को समझने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है, जिनमें महामारी फैलाने की क्षमता रखने वाले वायरस भी शामिल हैं। इसका मतलब है कि हम भविष्य में कोरोना जैसे या अन्य नए वायरसों के बारे में भी इसी तरह की महत्वपूर्ण जानकारी हासिल कर सकते हैं और उनसे लड़ने के लिए बेहतर तरीके ढूंढ सकते हैं। यह एक बड़ी उम्मीद की किरण है कि हम भविष्य में वायरसों के खिलाफ अपनी लड़ाई को और मजबूत बना पाएंगे।

रेकमेंडेड खबरें