शेयर बाजार में गिरावट: महंगाई, कच्चे तेल और पश्चिम एशिया तनाव का असर

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Navbharat Times
मुंबई, 25 जुलाई: इस सप्ताह भारतीय शेयर बाज़ार वैश्विक महंगाई की आशंकाओं, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण दबाव में रहा। पूरे सप्ताह के दौरान, निफ्टी में 2.33 प्रतिशत और सेंसेक्स में 2.68 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिन, निफ्टी50 0.43 प्रतिशत गिरकर 23,767 पर बंद हुआ, जबकि सेंसेक्स 331 अंक यानी 0.43 प्रतिशत फिसलकर 76,059 के स्तर पर आ गया। बाज़ार विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव और रेड सी में नाकेबंदी के चलते कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच गई है। इससे महंगाई बढ़ने की चिंताएँ और बढ़ गई हैं। इसी वजह से अमेरिका और भारत, दोनों देशों में बॉन्ड यील्ड (सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला ब्याज) में बढ़ोतरी हुई है। अब सितंबर में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना भी मजबूत होती दिख रही है। विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले टैरिफ (आयात शुल्क) को लेकर अनिश्चितताओं के फिर से सामने आने से घरेलू निवेशकों का भरोसा भी डगमगाया है। इसका सबसे ज़्यादा असर उन कंपनियों पर पड़ा है जो निर्यात (दूसरे देशों को सामान बेचना) करती हैं।

पूरे सप्ताह निवेशकों ने सावधानी बरती। पश्चिम एशिया में चल रहा भू-राजनीतिक तनाव, एशियाई बाज़ारों में कमजोरी और अमेरिकी व्यापार शुल्क को लेकर बढ़ती चिंताएँ बाज़ार पर हावी रहीं। विशेषज्ञों के अनुसार, जुलाई के पीएमआई (परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स) आँकड़ों से पता चला कि कारोबारी गतिविधियों में नरमी आई है और आर्थिक माहौल कमजोर हुआ है। इसका असर पूरे सप्ताह बाज़ार पर देखा गया। सबसे ज़्यादा बिकवाली लार्ज-कैप शेयरों (बड़ी कंपनियों के शेयर) में हुई, जिनका प्रदर्शन बाकी बाज़ार की तुलना में खराब रहा।
सेक्टोरल प्रदर्शन की बात करें तो, बैंकिंग और रियल एस्टेट शेयरों में सबसे ज़्यादा बिकवाली हुई। वहीं, मजबूत तिमाही नतीजों (कंपनियों के अच्छे नतीजे) के दम पर एफएमसीजी (रोज़मर्रा के इस्तेमाल की चीज़ें बनाने वाली कंपनियाँ) और ऑटो (गाड़ी बनाने वाली कंपनियाँ) सेक्टर के शेयरों ने अच्छा प्रदर्शन किया। विश्लेषकों का मानना है कि कंपनियों की कमाई में खास सुधार वित्त वर्ष 2026-27 की दूसरी छमाही से देखने को मिल सकता है। हालाँकि, इसके लिए कच्चे तेल की कीमतों का स्थिर होना और पश्चिम एशिया में तनाव कम होना बहुत ज़रूरी होगा।

इस दौरान, व्यापक बाज़ार (मिडकैप और स्मॉलकैप शेयर) भी दबाव में रहा। सप्ताह के दौरान निफ्टी मिडकैप-100 में 1.90 प्रतिशत और निफ्टी स्मॉलकैप-100 में 2.18 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। तकनीकी विश्लेषकों के अनुसार, निफ्टी के लिए 23,800 से 24,000 का स्तर एक तत्काल प्रतिरोध (रेजिस्टेंस) रहेगा, यानी इस स्तर को पार करना मुश्किल हो सकता है। वहीं, 23,700 से 23,600 का दायरा एक मजबूत सपोर्ट (सहारा) माना जा रहा है, यानी इस स्तर पर बाज़ार को सहारा मिल सकता है। बैंक निफ्टी के लिए 56,000 से 56,100 का स्तर तत्काल सपोर्ट है, जबकि 56,800 से 56,900 के बीच रेजिस्टेंस देखने को मिल सकता है।

आने वाले दिनों में निवेशकों की नज़र कच्चे तेल की कीमतों पर रहेगी। साथ ही, वैश्विक मौद्रिक नीति (दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों की नीतियाँ) से जुड़े संकेतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व (अमेरिका का केंद्रीय बैंक) के ब्याज दर संबंधी फैसले पर भी उनकी नज़रें टिकी रहेंगी। इसके अलावा, महंगाई के आँकड़े, जीडीपी ग्रोथ (देश की आर्थिक वृद्धि दर) और भारत के आईआईपी (औद्योगिक उत्पादन सूचकांक) के आँकड़े भी बाज़ार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

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