मीराबाई चानू ने कॉमनवेल्थ गेम्स में लगातार तीसरी बार जीता गोल्ड, परिवार और कोच को दिया श्रेय

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ग्लासगो में मीराबाई चानू ने लगातार तीसरी बार कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रच दिया है। 48 किलोग्राम वर्ग में यह शानदार जीत उन्होंने अपने परिवार के अटूट समर्थन, कोच विजय शर्मा के मार्गदर्शन और अपनी कड़ी मेहनत के दम पर हासिल की। चोटों और मुश्किलों से भरे सफर के बावजूद, मीराबाई ने अपने प्रदर्शन से सबको चौंका दिया और भारत के लिए पहला गोल्ड मेडल जीता। इस जीत के साथ ही उन्होंने स्नैच में नया रिकॉर्ड भी बनाया। नाइजीरिया की रूथ असुकुओ न्योंग ने सिल्वर और मलेशिया की आइरीन हेनरी ने ब्रॉन्ज मेडल जीता।

मीराबाई चानू ने अपनी इस ऐतिहासिक जीत का श्रेय अपने परिवार को दिया, जिन्होंने हर मुश्किल घड़ी में उनका साथ दिया। उन्होंने कहा, "मेरे परिवार ने आज तक मेरा बहुत साथ दिया है। मुझे कई चोटें लगीं, लेकिन मेरे परिवार ने मेरा बहुत समर्थन किया।" टोक्यो ओलंपिक की सिल्वर मेडलिस्ट मीराबाई ने अपने लंबे समय के कोच विजय शर्मा की भी अहम भूमिका बताई। उनके अनुसार, कोच शर्मा ने उन्हें खेल में लगातार अच्छा प्रदर्शन बनाए रखने और फोकस बनाए रखने में मदद की। मीराबाई ने बताया कि वे इस बार गेम्स में बहुत ज्यादा जोर नहीं लगाने वाले थे, लेकिन पहले प्रयास में गलती होने के बाद उन्होंने पूरी ताकत झोंक दी। उन्होंने यह भी कहा कि लंबे समय तक अपने शरीर का वजन 48 किलोग्राम वर्ग तक बनाए रखना उनके लिए बहुत मुश्किल रहा है।
31 वर्षीय वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने स्नैच में अपने पहले प्रयास में 82 किलोग्राम वजन उठाने में असफलता पाई, लेकिन दूसरे प्रयास में उन्होंने यह वजन सफलतापूर्वक उठाया। इसके बाद अपने आखिरी प्रयास में उन्होंने 85 किलोग्राम वजन उठाकर कॉमनवेल्थ गेम्स में स्नैच का नया रिकॉर्ड बनाया। 'क्लीन एंड जर्क' में उन्होंने बाकी खिलाड़ियों से आठ किलोग्राम ज्यादा वजन उठाया। हालांकि, पहली कोशिश में बार न उठा पाने के बावजूद, उन्होंने दूसरी कोशिश में 105 किलोग्राम वजन उठाकर आसानी से गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया। इस जीत के साथ ही मीराबाई ग्लासगो 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली भारतीय एथलीट बन गईं। इससे पहले भी उन्होंने गोल्ड कोस्ट 2018 और बर्मिंघम 2022 गेम्स में गोल्ड मेडल जीते थे।

जब पोडियम पर भारत का राष्ट्रगान बजा, तो मीराबाई चानू की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उन्होंने कहा, "जब हमारा राष्ट्रगान गाया जाता है, जब हम उसे सुनते हैं, तो अपने आप आंसू निकल आते हैं। ये खुशी के आंसू होते हैं, क्योंकि मैंने भारत के लिए पहला गोल्ड मेडल जीता था।"

इस प्रतियोगिता में नाइजीरिया की रूथ असुकुओ न्योंग ने कुल 168 किग्रा वजन (75 स्नैच और 93 क्लीन एंड जर्क) उठाकर सिल्वर मेडल जीता। पदक जीतने के बाद न्योंग ने 'आईएएनएस' से कहा, "यह पदक मेरे लिए काफी मायने रखता है, जिसे जीतना आसान नहीं था। मेरे दिमाग में सिर्फ पदक जीतना था। मुझे अपनी ट्रेनिंग पर विश्वास था। मैं अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहती थी। मैं मीराबाई चानू को गोल्ड जीतने पर बधाई देना चाहती हूं।"

मलेशिया की आइरीन हेनरी ने कुल 167 किग्रा (77 स्नैच और 90 क्लीन एंड जर्क) वजन उठाकर ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया। आइरीन ने 'आईएएनएस' से कहा, "यह पदक मेरे लिए काफी अहमियत रखता है। मुझे उम्मीद है कि इससे मलेशिया के लोगों को खुशी और गर्व का एहसास होगा। मैंने पहले भी मीराबाई चानू के खिलाफ खेला है। हम अच्छे दोस्त हैं। हम एक-दूसरे को इंस्टाग्राम पर फॉलो भी करते हैं।"

मीराबाई चानू की इस शानदार जीत पर एक फैन ने 'आईएएनएस' से कहा, "यह बहुत ही शानदार था। शेष खिलाड़ी 80-85 किग्रा वजन उठा रही थीं, लेकिन मीराबाई चानू ने 105 किग्रा भार उठा दिया। यह अविश्वसनीय था। इस खेल में उनका दबदबा नजर आया। भारत का नाम रोशन करने के लिए उन पर गर्व है।" एक अन्य फैन ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा, "मैं बहुत खुश हूं। मैंने इस तरह का इवेंट पहली बार देखा है। मीराबाई चानू ने अच्छा प्रदर्शन किया। भारत का राष्ट्रगान बजा, तो काफी गर्व महसूस हुआ। ये एक यादगार लम्हा है।"

मीराबाई चानू का यह सफर सिर्फ एक खेल प्रतियोगिता की जीत नहीं है, बल्कि यह दृढ़ संकल्प, कड़ी मेहनत और परिवार के प्यार की एक मिसाल है। चोटों से उबरकर वापसी करना और फिर से शीर्ष पर पहुंचना आसान नहीं होता। उन्होंने साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों और लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया जाए, तो कोई भी बाधा पार की जा सकती है। उनके परिवार का समर्थन, खासकर जब वह चोटिल थीं, उनके लिए एक बड़ी ताकत साबित हुआ। यह दिखाता है कि खेल में खिलाड़ियों की सफलता के पीछे उनके परिवार का कितना बड़ा योगदान होता है।

कोच विजय शर्मा की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। उन्होंने न केवल मीराबाई को तकनीकी रूप से प्रशिक्षित किया, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से भी मजबूत बनाया। खेल में लगातार अच्छा प्रदर्शन बनाए रखने के लिए अनुशासन और फोकस की जरूरत होती है, और विजय शर्मा ने यह सुनिश्चित किया कि मीराबाई इन दोनों चीजों पर कायम रहें। खेल के मैदान पर उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन एक अच्छे कोच का मार्गदर्शन खिलाड़ी को सही राह दिखाता है।

मीराबाई चानू ने जिस तरह से अपने वजन को नियंत्रित रखा और 48 किलोग्राम वर्ग में प्रतिस्पर्धा की, वह अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। वेटलिफ्टिंग में वजन वर्ग बहुत मायने रखता है, और अपने शरीर के वजन को एक निश्चित सीमा में रखना बहुत मुश्किल होता है। मीराबाई ने इस चुनौती को स्वीकार किया और उस पर विजय प्राप्त की, जो उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमता का प्रमाण है।

स्नैच और क्लीन एंड जर्क में उनके द्वारा उठाए गए वजन ने न केवल उन्हें गोल्ड मेडल दिलाया, बल्कि कॉमनवेल्थ गेम्स में स्नैच का नया रिकॉर्ड भी स्थापित किया। यह उनकी ताकत और तकनीक का बेहतरीन प्रदर्शन था। जब उन्होंने पहली बार बार उठाने में असफलता पाई, तो शायद कुछ लोग निराश हुए होंगे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी गलती से सीखा और अगले ही प्रयास में शानदार वापसी की। यह जज्बा ही उन्हें एक चैंपियन बनाता है।

भारत के लिए पहला गोल्ड मेडल जीतना और राष्ट्रगान बजते हुए आंसू आना, यह एक ऐसा पल होता है जिसे कोई भी खिलाड़ी कभी नहीं भूल सकता। यह सिर्फ एक पदक नहीं होता, बल्कि देश के लिए कुछ कर दिखाने का गर्व होता है। मीराबाई चानू ने इस पल को जिया और पूरे देश को गौरवान्वित किया।

अन्य देशों के खिलाड़ियों, जैसे रूथ असुकुओ न्योंग और आइरीन हेनरी, ने भी अच्छा प्रदर्शन किया और मीराबाई को बधाई दी। यह खेल भावना का एक सुंदर उदाहरण है, जहां प्रतिद्वंद्वी भी एक-दूसरे की सफलता का सम्मान करते हैं। आइरीन हेनरी का यह कहना कि वे मीराबाई को इंस्टाग्राम पर फॉलो करती हैं और अच्छे दोस्त हैं, यह दिखाता है कि खेल के मैदान के बाहर भी खिलाड़ियों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध होते हैं।

मीराबाई चानू की जीत ने भारत के खेल प्रेमियों में भी उत्साह भर दिया है। फैंस का यह कहना कि उन्होंने इस तरह का दबदबा पहले कभी नहीं देखा, यह उनकी असाधारण प्रतिभा को दर्शाता है। यह जीत युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी, जो वेटलिफ्टिंग में अपना करियर बनाना चाहते हैं। यह साबित करता है कि कड़ी मेहनत और लगन से कोई भी सपना पूरा किया जा सकता है। यह एक यादगार लम्हा है जिसने भारत का नाम रोशन किया है।

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