न्यायाधीशों का स्थानांतरण न्यायपालिका का आंतरिक मामला: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस भुयान

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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि जजों का तबादला न्यायपालिका का आंतरिक मामला है। इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं होती। न्यायपालिका की स्वतंत्रता समझौता न करने वाली बात है। जजों का तबादला हमेशा न्याय के बेहतर प्रशासन के लिए होता है। यह न्यायपालिका का अपना काम है। सरकार का इसमें कोई दखल नहीं हो सकता।

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पुणे, 24 जनवरी (PTI) - सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने शनिवार को पुणे में कहा कि जजों का तबादला न्यायपालिका का अंदरूनी मामला है और इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं होती। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता "समझौता न करने वाली" बात है।

जस्टिस भुइयां ने ILS लॉ कॉलेज में जी. वी. पंडित मेमोरियल लेक्चर देते हुए यह बात कही। उन्होंने जोर देकर कहा कि जजों का तबादला हमेशा न्याय के बेहतर प्रशासन के लिए होता है। यह न्यायपालिका का अपना काम है। सरकार का इसमें कोई दखल नहीं हो सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार जजों के तबादले और तैनाती में कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती। सरकार यह तय नहीं कर सकती कि किस जज का तबादला होना चाहिए या नहीं, या फिर किस हाई कोर्ट में होना चाहिए।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान का एक बुनियादी ढांचा है, जिसे बदला नहीं जा सकता। जस्टिस भुइयां ने कहा कि न्यायपालिका के सदस्यों को हर कीमत पर अपनी स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए। ऐसा इसलिए जरूरी है ताकि न्यायपालिका प्रासंगिक बनी रहे और लोगों का उस पर भरोसा कायम रहे।

उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका के लिए विश्वसनीयता बहुत महत्वपूर्ण है। अगर हम अपनी विश्वसनीयता खो देते हैं, तो न्यायपालिका के पास कुछ नहीं बचेगा। अदालतें होंगी, जज होंगे, वे फैसले भी सुनाएंगे, लेकिन उसका दिल और आत्मा खत्म हो जाएगी।

जस्टिस भुइयां ने इस बात पर भी जोर दिया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखना जजों की जिम्मेदारी है। यह सुनिश्चित करना उनका कर्तव्य है कि न्यायपालिका निष्पक्ष और स्वतंत्र बनी रहे। तभी लोग न्यायपालिका पर भरोसा कर पाएंगे और न्याय व्यवस्था मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि जजों का तबादला न्याय के हित में ही किया जाता है। यह न्यायपालिका का आंतरिक निर्णय होता है। सरकार का इसमें कोई लेना-देना नहीं होता। सरकार यह तय नहीं कर सकती कि किस जज को कहां भेजा जाए।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान का एक अहम हिस्सा बताया गया है। इसे किसी भी हाल में कम नहीं किया जा सकता। जजों को अपनी स्वतंत्रता को हर हाल में बचाना चाहिए। इससे ही न्यायपालिका की अहमियत बनी रहेगी। जजों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्यायपालिका पर लोगों का विश्वास बना रहे।

जस्टिस भुइयां ने कहा कि न्यायपालिका की साख बहुत मायने रखती है। अगर यह साख खत्म हो गई तो न्यायपालिका का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। अदालतें चलेंगी, जज भी होंगे, फैसले भी होंगे, लेकिन न्यायपालिका की आत्मा मर जाएगी। इसलिए, जजों को अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।