घर टूटे-बने, सदियों से नहीं बदला इनका पता

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centuries old delhi addresses where homes rebuilt but identity remained
दिल्ली-6 की तंग गलियों में रोज की रफ्तार ऐसी है कि सांस लेने को भी वक्त नहीं मिलता। ई-रिक्शे हॉर्न बजाते हुए निकलते हैं और मसालों की खुशबू हवा में घुली रहती है। इस भागमभाग के बीच कुछ परिवार ऐसे हैं, जिनकी जड़ें सदियों पुरानी हैं। घर कई बार टूटे, कई बार बने। बारिश में दीवारें गिर गईं, परिवार बढ़ा तो मंजिलें जुड़ीं, लेकिन पता वही रहा। वही गली, वही मोहल्ला, वही अपनापन।

320 साल पुरानी हवेली । मुनीब अहमद सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं। उनका घर है ‘शरीफ मंजिल’। बल्लीमारान की इस हवेली में रहते हुए उनके खानदान को 320 साल से ज्यादा हो चुके हैं। 1915 में जब महात्मा गांधी पहली बार दिल्ली आए थे, तब 13 अप्रैल को उन्होंने हकीम अजमल खान से यहीं मुलाकात की थी। हकीम साहब आजादी के योद्धा थे और यूनानी इलाज के बड़े जानकार। मुनीब के परदादा के पिता थे हकीम साहब।
पुराना जादू । थोड़ी दूर दरियागंज में रंगकर्मी और कवि लोकेश जैन रहते हैं। 100 साल से ज्यादा हो गए उनके परिवार को इसी घर में। लोकेश थिएटर के जरिए आम लोगों की कहानियां सुनाते हैं। उन्हें मोहल्ले का पुराना अंदाज बहुत पसंद है। जहां पड़ोसी अब भी एक-दूसरे को नाम से जानते हैं। त्योहार आए तो पूरा मोहल्ला एक साथ खुशियां मनाता है। लोकेश का घर कई बार मरम्मत से गुजरा है।

सबसे पुरानी बस्ती । महरौली दिल्ली की सबसे पुरानी बस्तियों में गिनी जाती है। यहां राजिंदर कुमार रहते हैं। सोशल वर्कर हैं। उनकी जड़ें इस मिट्टी से 450 साल से जुड़ी हैं। राजिंदर आज भी उसी घर में रहते हैं, जहां उनके पुरखे सदियों से रहे। वह महरौली का हिस्सा हैं। उन्हें यहां की मिट्टी पहचानती है। वह किसी नई कॉलोनी में जा सकते थे, लेकिन इस जगह ने उन्हें जाने ही नहीं दिया। राजिंदर को लगता है कि अगर वह यहां से कहीं गए, तो पुरखों की आत्मा दुखी होगी। समय के साथ उनके घर का रंग-रूप कई बार बदला है। अब टाइल्स और एसी लग चुके हैं। हालांकि धड़कन पुराने महरौली की ही है।

शाहदरा का सौहार्द । नरेश कौशिक शिक्षक हैं। शाहदरा में उनके परिवार को बसे लगभग 190 साल हो गए। उनके पिता बी.डी. संतोषी स्वतंत्रता सेनानी थे। 9 सितंबर, 1947 को गांधी जी दिल्ली आए, तो वह भी उनकी अगवानी करने पहुंचे थे। नरेश को शाहदरा का सामाजिक ताना-बाना और वहां का सौहार्द पसंद है।

मजबूत रिश्ता । इन सब परिवारों में एक बात समान है- अपने पुरखों के घर से गहरा लगाव। इन पुरानी बस्तियों में रहना आसान नहीं। गलियां तंग हैं, पार्किंग की आफत और आधुनिक सुविधाएं ना के बराबर। फिर भी ये लोग यहीं टिके हुए हैं, क्योंकि इनके लिए घर बस ईंट-पत्थर नहीं, यादों का खजाना है।

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