86 साल की दर्शना ने दर्शायी नायिका की मनोदशा

नवभारत टाइम्स

लखनऊ में 19वें सारंगदेव महोत्सव का आयोजन हुआ। इसमें पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज की स्मृति में कार्यक्रम हुए। मणिपुरी नृत्यांगना दर्शना झावेरी ने नायिका की मनोदशा को नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया। ध्रुपदांगी कथक की प्रस्तुति भी हुई। महोत्सव में विभिन्न कलाओं पर व्याख्यान और शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।

86 साल की दर्शना ने दर्शायी नायिका की मनोदशा
लखनऊ में 19वें सारंगदेव महोत्सव का दूसरा दिन मणिपुरी नृत्य और कथक की ध्रुपदांगी परंपरा के नाम रहा। इस मौके पर पद्मविभूषण पं. बिरजू महाराज को याद किया गया। भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय और महागामी गुरुकुल कला एवं शोध संस्थान, छत्रपति संभाजी नगर ने मिलकर इस महोत्सव का आयोजन किया।

महोत्सव के पहले सत्र में 86 वर्षीय मणिपुरी नृत्यांगना दर्शना झावेरी ने अपने नृत्य से समा बांध दिया। उन्होंने बताया कि मणिपुरी नृत्य में 'नायिका भेद' और 'पदावली' का खास महत्व है। इसमें विद्यापति और नरोत्तम जैसे कवियों की रचनाओं का इस्तेमाल होता है। दर्शना झावेरी ने मंच पर 'खंडित नायिका' की मनःस्थिति को अपने नृत्य से बखूबी दर्शाया। उन्होंने यह भी बताया कि मणिपुर में साल भर त्योहार चलते हैं और इन त्योहारों में शास्त्रीय नृत्य की प्रस्तुतियां दी जाती हैं। इसी सत्र में उस्ताद वासिफुद्दीन डागर ने ध्रुपद गायन पर अपने विचार रखे, जबकि पार्वती दत्ता ने 'संगीत रत्नाकर' से जुड़ी अवधारणाओं पर प्रकाश डाला। दूसरे सत्र में शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए।
महोत्सव के तीसरे सत्र में विश्वविद्यालय के कला मंडपम सभागार में ओडिसी और कथक की जानी-मानी नृत्यांगना पार्वती दत्ता और उनके समूह ने 'ध्रुपदांगी कथक' की प्रस्तुति दी। पार्वती दत्ता ने समझाया कि ध्रुपदांगी परंपरा में भक्ति और प्रेम रस की प्रधानता होती है। इसमें ब्रजभाषा का खूब इस्तेमाल होता है। उन्होंने बताया कि ध्रुपद गायन की चार मुख्य शैलियां हैं: खंडारी, नौहरी, गौरहारी और डागुर। ध्रुपद रचना के चार अंग होते हैं - स्थायी, अंतरा, संचारी और आभोग। डागर घराना सबसे मशहूर और पुराना माना जाता है, जो अपनी खास 'अलाप' के लिए जाना जाता है। दरभंगा घराना राधाकृष्ण और कर्ता राम ने शुरू किया था। बेतिया घराना नौहार और खंडार शैलियों का प्रयोग करता है।

विश्वविद्यालय के नृत्य विभागाध्यक्ष ज्ञानेंद्र दत्त बाजपेयी ने कृष्ण पर आधारित 'वर्णम' की प्रस्तुति दी। भरतनाट्यम की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रुचि खरे और विश्वविद्यालय की छात्रा वल्लरी नारायण पाठक ने भी कथक की प्रस्तुति दी। इस महोत्सव में कला के विभिन्न रूपों का संगम देखने को मिला, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह आयोजन भारतीय शास्त्रीय संगीत और नृत्य की समृद्ध परंपराओं को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास था।