Dr Ram Manohar Lohias Protest In Berlin A Historic Moment For Indias Independence
बर्लिन में विरोध
नवभारत टाइम्स•
बर्लिन में पढ़ाई कर रहे युवा राम मनोहर लोहिया भारत की दासता से दुखी थे। जिनेवा में लीग ऑफ नेशंस में उन्होंने अंग्रेजी शासन की प्रशंसा का विरोध किया। उन्हें सभागार से बाहर कर दिया गया। अगले दिन उन्होंने पत्र लिखकर भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की फांसी का उल्लेख कर विश्व के सामने भारत की सच्चाई रखी।
जर्मनी में पढ़ाई कर रहे युवा डॉ. राम मनोहर लोहिया भारत की गुलामी से बहुत दुखी थे। वे बर्लिन के हम्बोल्ट विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र में पीएचडी कर रहे थे, लेकिन उनका मन बेचैन रहता था। लोहिया आगे चलकर समाजवादी आंदोलन के बड़े नेता बने। उनके पिता हीरालाल स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे और अंग्रेजों के जुल्मों और जनता की तकलीफों के बारे में चिट्ठियों में लिखते थे। इन चिट्ठियों ने लोहिया के अंदर अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने की आग और भड़का दी। इसी बीच जिनेवा में लीग ऑफ नेशंस का एक सम्मेलन हुआ। बीकानेर के महाराजा वहां भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जब लोहिया ने मंच से अंग्रेजों की तारीफ सुनी, तो उन्हें बहुत दुख हुआ और उन्होंने इसका विरोध किया। उन्हें तुरंत हॉल से बाहर निकाल दिया गया। अगले दिन एक अखबार में उनका एक पत्र छपा। इसमें उन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों और भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की फांसी का जिक्र करते हुए दुनिया को भारत की सच्चाई बताई।
डॉ. राम मनोहर लोहिया, जो उस समय जर्मनी में पीएचडी कर रहे थे, भारत की आजादी के लिए तड़प रहे थे। बर्लिन के हम्बोल्ट विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की पढ़ाई करते हुए भी उनका मन देश की गुलामी से बेचैन रहता था। उनके पिता, हीरालाल, खुद स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेते थे। वे अक्सर अपने पत्रों में अंग्रेजों के जुल्मों और आम लोगों की परेशानियों का जिक्र करते थे। इन बातों ने युवा लोहिया के दिल में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने की चिंगारी को और तेज कर दिया।एक बार जिनेवा में लीग ऑफ नेशंस का अधिवेशन हुआ। उस समय बीकानेर के महाराजा भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जब लोहिया ने वहां मंच से अंग्रेजों की तारीफ सुनी, तो उन्हें बहुत बुरा लगा। उन्होंने तुरंत इसका विरोध किया। इस विरोध के कारण उन्हें सभागार से बाहर निकाल दिया गया। लेकिन लोहिया रुके नहीं। अगले दिन एक अखबार में उनका एक पत्र छपा। इस पत्र में उन्होंने अंग्रेजों के जुल्मों की दास्तान सुनाई। उन्होंने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी का भी जिक्र किया। इस तरह उन्होंने दुनिया के सामने भारत की असली तस्वीर पेश की।