Ai To Bring New Good News To Science Revolution In Scientific Discoveries In 2025 2026
AI साइंस को देगा नई ख़ुशख़बरी
नवभारत टाइम्स•
विज्ञान के क्षेत्र में एआई नई उम्मीदें जगा रहा है। यह वैज्ञानिक खोजों को गति देगा। सौर ऊर्जा, क्वांटम कंप्यूटिंग और चंद्र अभियानों में भी बड़ी सफलताएं मिलेंगी। कार्बन उत्सर्जन पर अंकुश लगाने के प्रयास जारी हैं। सेल्फ हीलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी नई तकनीकें भी सामने आएंगी। ये सभी मिलकर भविष्य को बेहतर बनाएंगे।
इक्कीसवीं सदी की पहली चौथाई के अंत में, दुनिया को कई रोमांचक वैज्ञानिक और तकनीकी खबरें मिल रही हैं। दिसंबर 2025 में, जापानी खगोलविदों ने सौरमंडल के बाहरी हिस्से में एक नौवें ग्रह के संकेत पाए हैं, जो नेप्च्यून के बाद सबसे दूर का ग्रह हो सकता है। वहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एजेंट्स का दौर शुरू हो चुका है, जो वैज्ञानिक खोजों में क्रांति ला सकते हैं और 2026 तक AI से बड़ी वैज्ञानिक खोज की उम्मीद है। कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, जहां 2025 में सौर और पवन ऊर्जा से कोयले और गैस के बराबर बिजली का उत्पादन हुआ, और चीन जैसे बड़े उत्सर्जक देशों ने भी अपने उत्सर्जन को स्थिर कर लिया है। पेरोव्स्काइट केमिकल से बनी सौर पैनलों की दक्षता 34% से ऊपर पहुंच गई है, और सस्ती, सुरक्षित बैटरियों की खोज भी 2025 की बड़ी उपलब्धि है। क्वांटम कंप्यूटिंग में भी माइक्रोसॉफ्ट की मायोराना-1 क्वांटम चिप जैसी क्रांतिकारी पहलें सामने आई हैं, जो भविष्य में कंप्यूटिंग की दुनिया बदल सकती हैं। सेल्फ हीलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, जो पुलों, इमारतों और पाइपलाइनों को खुद-ब-खुद ठीक कर सकता है, समाज को हर साल ढाई लाख करोड़ डॉलर के नुकसान से बचा सकता है। इसके अलावा, 2026 को चंद्र अभियानों का साल कहा जा रहा है, जिसमें नासा का आर्टेमिस-2 मिशन चंद्रमा का चक्कर लगाएगा और चीन का चांग ई-7 मिशन दक्षिणी ध्रुव पर पानी की तलाश करेगा, जबकि भारत का गगनयान मिशन रोबोट को अंतरिक्ष में भेजकर मानव शरीर पर अंतरिक्ष यात्रा के प्रभावों का अध्ययन करेगा।
सौरमंडल में नौवें ग्रह की दस्तक?इक्कीसवीं सदी की शुरुआत कुछ ऐसी खबरों के साथ हो रही है जो हमारे ब्रह्मांड और भविष्य के बारे में हमारी समझ को बदल सकती हैं। प्लूटो को ग्रह का दर्जा मिलने के बाद, नेप्च्यून हमारे सौरमंडल का सबसे दूर का ग्रह बन गया था। लेकिन दिसंबर 2025 के आखिरी हफ्तों में, जापानी खगोलविदों ने एक ऐसी खोज की है जिसने सबको चौंका दिया है। उन्होंने 1983 और 2006 में खींची गई सौरमंडल के बाहरी हिस्सों की तस्वीरों की तुलना की। इन तस्वीरों को इन्फ्रारेड इमेजिंग वाले दो सैटेलाइटों से लिया गया था। तुलना करने पर, उन्हें पता चला कि इन 23 सालों में कुछ ऐसा है जो अपनी जगह से हिल गया है। यह बर्फीली चीज धरती से 7 से 17 गुना भारी हो सकती है। खगोलविदों का मानना है कि यह सौरमंडल का नौवां ग्रह हो सकता है। यह खोज वाकई में रोमांचक है और हमें अपने सौरमंडल के बारे में और जानने का मौका देगी।
AI एजेंट्स: वैज्ञानिक खोजों का नया युग
तकनीक की दुनिया में आजकल सबसे ज्यादा चर्चा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की हो रही है। AI एजेंट्स का दौर अब शुरू हो चुका है। ये AI एजेंट्स खास तरह के AI प्रोग्राम हैं जो वैज्ञानिक रिसर्च में बहुत काम आ सकते हैं। ये कई बड़े लैंग्वेज मॉडल्स (LLM) की मदद से ऐसे मुश्किल सवालों के जवाब ढूंढ सकते हैं जिनका हल अभी तक नहीं मिला है। भारत समेत दुनिया के कई देशों में ऐसी कोशिशें चल रही हैं। सबसे खास बात यह है कि AI की मदद से कोई बड़ी वैज्ञानिक खोज शायद 2026 तक सुनने को मिल जाए। हम इस मुकाम के बहुत करीब पहुंच चुके हैं। सोचिए, AI की मदद से हम उन रहस्यों को सुलझा पाएंगे जो अभी तक अनसुलझे हैं!
कार्बन उत्सर्जन पर लगाम: एक उम्मीद की किरण
2016 में पेरिस में जलवायु समझौता हुआ था। इसमें यह तय किया गया था कि 2035 तक दुनिया का कुल कार्बन उत्सर्जन, 2016 के मुकाबले आधा कर दिया जाएगा। यह लक्ष्य हासिल करना थोड़ा मुश्किल लग रहा है, लेकिन अच्छी खबर यह है कि 2025 में दुनिया ने सौर पैनलों और पवन चक्कियों से उतनी ही बिजली बनाई, जितनी कोयले और गैस से बनती है। यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इतना ही नहीं, दुनिया का 35% कार्बन उत्सर्जित करने वाला देश चीन, जिसने पहले अपने उत्सर्जन को लगातार बढ़ाया था, अब उसने अपने उत्सर्जन को बढ़ने से रोक दिया है। इसका मतलब है कि कार्बन उत्सर्जन को कम करने का रास्ता खुल रहा है। यह हमारे ग्रह के भविष्य के लिए बहुत अच्छी खबर है।
केमिकल लेप से बिजली: पेरोव्स्काइट का कमाल
सौर बिजली बनाने के लिए पेरोव्स्काइट नाम के केमिकल का इस्तेमाल करने का काम काफी समय से चल रहा था, लेकिन इसमें कुछ दिक्कतें थीं। यह केमिकल नमी और धूप को ज्यादा देर तक झेल नहीं पाता था। इसलिए, वैज्ञानिक पारंपरिक सिलिकॉन पैनल और पेरोव्स्काइट को मिलाकर कुछ नया करने की कोशिश कर रहे थे। दुनिया भर में ऐसे प्रयोग चल रहे थे। लेकिन 2025 में, चीन के वैज्ञानिकों ने बाजी मार ली। उन्होंने ऐसे टैंडेम सेल्स (दो अलग-अलग तरह की तकनीकों को मिलाकर बने सेल) की बिजली उत्पादन क्षमता को 34% से भी ऊपर पहुंचा दिया। यह सेल कम धूप में भी बिजली बना लेता है। इसके साथ ही, 2025 में दो सस्ती, सुरक्षित और छोटी बैटरियों की खोज भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही। ये बैटरियां सौर ऊर्जा को स्टोर करने में मदद करेंगी।
क्वांटम कंप्यूटर : भविष्य की क्रांति
2035 तक फ्रांस में चल रहे फ्यूजन एनर्जी प्रोजेक्ट को 500 मेगावाट क्षमता वाले पावरहाउस में बदलने का लक्ष्य है। बीते दिसंबर में, जर्मनी की एक लैब ने एक बड़ी सफलता हासिल की। उन्होंने दस करोड़ डिग्री सेल्सियस वाला फ्यूजन प्लाज्मा आधे घंटे तक टिकाए रखा। यह बहुत बड़ी बात है, क्योंकि पहले तो कुछ सेकंड प्लाज्मा को टिकाना भी मुश्किल होता था। एक और बड़ा लक्ष्य क्वांटम कंप्यूटर से जुड़ा है। इस साल क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में कई बड़ी सफलताएं मिली हैं। इनमें माइक्रोसॉफ्ट की मायोराना-1 क्वांटम चिप को सबसे क्रांतिकारी पहल माना जा रहा है। हालांकि, असली कमाल तो तब होगा जब क्वांटम कंप्यूटर अपनी असाधारण क्षमताओं के साथ आम इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाएंगे। ये कंप्यूटर आज के सुपरकंप्यूटर से कहीं ज्यादा शक्तिशाली होंगे और कई जटिल समस्याओं को चुटकियों में हल कर देंगे।
सेल्फ हीलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर: टूटेगा नहीं, खुद ठीक होगा
एक बहुत बड़ी खोज सेल्फ हीलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में हुई है। सोचिए, अगर कोई बड़ा पुल, इमारत, तेल पाइपलाइन या कोई बड़ी मशीन अपने बनने के समय रह गई छोटी-मोटी दरारों या किसी और अनदेखी खराबी के कारण जल्दी खराब हो जाए, तो समाज को कितना नुकसान होता है। एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया को हर साल इस वजह से ढाई लाख करोड़ डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है। लेकिन अब, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), सेल्फ हीलिंग मटेरियल (खुद को ठीक करने वाली सामग्री) और कंट्रोल्ड रिलीज मैकेनिज्म (नियंत्रित तरीके से निकलने वाली प्रणाली) की मदद से इस समस्या को जड़ से खत्म करना संभव हो गया है। अब आप किसी ढांचे पर सिर्फ एक महंगा पेंट लगाकर उसकी सुरक्षा को लेकर चिंतामुक्त हो सकते हैं। यह पेंट छोटी-मोटी दरारों को खुद-ब-खुद भर देगा।
चंद्र अभियानों में तेजी: चांद पर नई दौड़
साल 2026 को चंद्र अभियानों का साल भी कहा जा रहा है। नासा का आर्टेमिस-2 मिशन इस साल अपने चार अंतरिक्षयात्रियों को ओरियन स्पेसक्राफ्ट से दस दिन के मिशन पर चंद्रमा का चक्कर लगाने भेज रहा है। यह मिशन इंसानों को फिर से चांद के करीब ले जाएगा। चीन भी अपने सफल चंद्र अभियानों की कड़ी में चांग ई-7 मिशन को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतारने की तैयारी कर रहा है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य वहां पानी की तलाश करना होगा। भारत भी पीछे नहीं है। हमारा गगनयान मिशन जनवरी से मार्च के बीच कभी भी एक रोबोट को लेकर अंतरिक्ष में जा सकता है। इसका मकसद इंसानी शरीर पर अंतरिक्ष यात्रा के प्रभावों को समझना होगा। यह मिशन भविष्य में इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने की तैयारी का एक अहम हिस्सा है।