सरकार अब दूसरे शहरों का भी विकास करो

नवभारत टाइम्स

लखनऊ में बढ़ता ट्रैफिक जाम एक गंभीर समस्या बन गया है। इसका मुख्य कारण दूसरे शहरों का विकास न होना है। लोग बेहतर सुविधाओं के लिए लखनऊ की ओर पलायन कर रहे हैं। सरकार को विकास को विकेंद्रीकृत करने की आवश्यकता है। हर जिले में अच्छी सुविधाएं उपलब्ध कराने से ही इस समस्या का समाधान संभव है।

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लखनऊ में बढ़ता ट्रैफिक जाम सिर्फ सड़कों की समस्या नहीं है, बल्कि यह दूसरे जिलों से राजधानी की ओर होने वाले पलायन का नतीजा है। मास्टर प्लान की धज्जियां उड़ाकर किए गए अवैध निर्माणों और विभिन्न सरकारी महकमों की मिलीभगत ने शहर की सड़कों को ट्रैफिक जाम का संग्रहालय बना दिया है। सरकारें विकास को विकेंद्रीकृत करने में नाकाम रहीं, जिसके कारण लोग बेहतर सुविधाओं के लिए लखनऊ की ओर भाग रहे हैं।

एहतिशाम अली का शेर है- "हम एक शहर में थे इक नदी की दूरी पर और उस नदी में कोई और वक़्त बहता था।" यह शेर लखनऊ के बचपन की याद दिलाता है, जब अमीनाबाद जैसे इलाके चौपहिया गाड़ियों के लिए भी मुश्किल थे। लेखक ने खुद बचपन से लेकर होश संभालने तक शहर को बदलते देखा है। उन्होंने देखा कि कैसे मास्टर प्लान को ताक पर रखकर अवैध निर्माण हुए। कैसे विकास प्राधिकरण, नगर निगम, पुलिस और वकीलों के एक खास तबके की मिलीभगत से सड़कें ट्रैफिक जाम का अड्डा बन गईं। इन सबके लेखक गवाह रहे हैं।
आज हालात यह हैं कि सड़कों पर आम आदमी का चलना मुश्किल हो गया है। सरकार और हाई कोर्ट के बड़े लोगों के अलावा बाकी सब जाम में फंसते हैं। जाम खत्म करने और अतिक्रमण हटाने की कोशिशें ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही हैं। लेखक का मानना है कि यह जाम सिर्फ लखनऊ की समस्या नहीं है। इसकी असली वजह दूसरे जिलों से लखनऊ की ओर होने वाला पलायन है।

लोग बेहतर इलाज के लिए लखनऊ आते हैं, अच्छी पढ़ाई के लिए लखनऊ आते हैं, नौकरी, परीक्षा, कोचिंग, दफ्तर, कोर्ट, मंत्रालय और मॉल में खरीदारी के लिए भी लखनऊ आते हैं। कुछ भी करने के लिए लोग लखनऊ का रुख करते हैं। यही पलायन लखनऊ में लगने वाले जाम का अदृश्य इंजन है। सालों से सभी सरकारों ने एक ही गलती की है। वे विकास को पूरे देश में फैला नहीं पाईं। हर जिले में अच्छे अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, मॉल, मनोरंजन केंद्र और अच्छी आवासीय योजनाएं होनी चाहिए थीं। लेकिन इन सारी सुविधाओं को कुछ बड़े शहरों, जैसे लखनऊ, तक सीमित कर दिया गया। इसका नतीजा आज सबके सामने है।

ट्रैफिक और यातायात की हालत इन्हीं वजहों से और भी खराब हो गई है। लखनऊ में फिलहाल 32 लाख से ज्यादा गाड़ियां हैं। इसके अलावा, करीब डेढ़ लाख गाड़ियां रोजाना दूसरे जिलों से लखनऊ आती-जाती रहती हैं। पिछले एक साल में ही दो लाख नई गाड़ियां लखनऊ की सड़कों पर आ गईं, और पुरानी खराब गाड़ियां भी चलन से बाहर नहीं हुईं।

लेखक का कहना है कि सच तो यह है कि जाम सड़कों पर नहीं, बल्कि नीतियों पर लगा है। जब तक यह जाम नहीं छंटता, तब तक हर नया फ्लाईओवर एक नया मजाक बनकर सामने आएगा। ऐसा हमेशा से होता आया है क्योंकि नीतियों को हमेशा अपने और पराये के नाम पर चुना जाता रहा है। गोमतीनगर रेलवे ओवर ब्रिज के नीचे लोग गलत साइड से इसलिए नहीं चलते क्योंकि उन्हें ऐसा करना पसंद है। दरअसल, मिठाईवाले चौराहे से जो एंट्री दी गई है और उसके ऊपर जो आरओबी (रेलवे ओवर ब्रिज) बना है, वह हमारी महान रोड इंजीनियरिंग का एक बेहतरीन नमूना है। ऐसे ही और नमूने देखने हों तो सीतापुर रोड पर उतरने वाले ब्रिज को देखिए।

ताजा उदाहरण किसान पथ आउटर रिंग रोड और नई बन रही आईआईएम रोड है। यह ग्रीन कॉरिडार जब शुरू होगा और आप इसके जाम में फंसेंगे, तब आपको यह लेख याद आएगा। आखिर में, जावेद नासिर का यह शेर इस बात को खत्म करता है: "दोस्तो तुम से गुज़ारिश है यहाँ मत आओ इस बड़े शहर में तन्हाई भी मर जाती है।" यह शेर बताता है कि बड़े शहरों में सुविधाएं तो हैं, लेकिन अकेलापन भी बहुत है।