Holi A Festival To Forget Differences Increase Love And Promote Tolerance
मनमुटाव भुलाकर प्रेम बढ़ाने का अवसर है होली
Contributed by: निर्मल जैन|नवभारत टाइम्स•
होली का पर्व गिले-शिकवे भुलाकर प्रेम बढ़ाने का अवसर है। यह त्योहार जाति, धर्म और वर्ग की दीवारों को तोड़ता है। होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। ब्रज की होली राधा-कृष्ण के प्रेम से जुड़ी है। सिख धर्म में होला मोहल्ला वीरता का प्रदर्शन है। दक्षिण भारत में कामदहन के रूप में मनाया जाता है।
होली का त्योहार सिर्फ रंग खेलने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह सहिष्णुता का संदेश देता है जो जाति, धर्म और वर्ग की दीवारों को तोड़ता है। यह त्योहार भगवान विष्णु के प्रति अटूट विश्वास की जीत और बुराई के अंत का प्रतीक है, जैसा कि होलिका दहन से पता चलता है। ब्रज की होली राधा-कृष्ण के प्रेम से जुड़ी है, जो इसे सामाजिक बंधनों से मुक्त कर आनंद का उत्सव बनाती है। सिख धर्म में, गुरु गोविंद सिंह जी ने 'होला महल्ला' की शुरुआत की, जो वीरता और सैन्य प्रशिक्षण का प्रदर्शन है। दक्षिण भारत में इसे 'कामदहन' के रूप में मनाया जाता है, जो कामदेव के बलिदान और पुनर्जन्म की खुशी में होता है। जैन धर्म में, होली मैत्री भाव और क्षमा का संदेश देती है। यह त्योहार विज्ञान, मनोविज्ञान और प्राचीन परंपराओं का संगम है, जो वसंत के आगमन और नई फसल का स्वागत करता है। प्राचीन काल में प्राकृतिक रंगों का उपयोग स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद था। हालांकि, आधुनिकता की दौड़ में इस पवित्र पर्व में कुछ विकृतियां आ गई हैं, और मानवता की पुकार है कि इसे 'इको-फ्रेंडली' बनाया जाए।
होली का त्योहार, जिसे हम 'बुरा न मानो होली है' के नारे के साथ मनाते हैं, वास्तव में एक गहरा संदेश लेकर आता है। यह संदेश है सहिष्णुता का, जो हमें जाति, धर्म और वर्ग की बनाई हुई दीवारों को गिराने के लिए प्रेरित करता है। यह सिर्फ रंग, गुलाल और पकवानों का त्योहार नहीं है। हिंदू धर्म में, होलिका दहन हमें सिखाता है कि कैसे भगवान विष्णु के प्रति अटूट विश्वास ने अहंकार और बुराई पर विजय प्राप्त की। यह बुराई के अंत का प्रतीक है।ब्रज की होली तो सीधे-सीधे राधा और कृष्ण के दिव्य प्रेम से जुड़ी है। जब श्रीकृष्ण गोपियों और राधा पर रंग डालते थे, तो यह त्योहार सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर निश्छल प्रेम और आनंद का उत्सव बन जाता था। यह हमें सिखाता है कि प्रेम में कोई बंधन नहीं होता।
सिख धर्म ने भी होली को एक नया और वीरतापूर्ण रूप दिया है। गुरु गोविंद सिंह जी ने होली के अगले दिन 'होला महल्ला' की शुरुआत की थी। इसका मकसद सिखों को सैन्य प्रशिक्षण, कुश्ती और शस्त्र विद्या में माहिर बनाना था। वे 'रंगों' के साथ-साथ अपनी शौर्य और वीरता का भी प्रदर्शन करते थे। यह त्योहार हमें अपनी ताकत और साहस दिखाने का मौका देता है।
दक्षिण भारत में, होली को एक अलग अंदाज में मनाया जाता है। वहां इसे 'कामदहन' कहते हैं। यह कामदेव के बलिदान और उनके फिर से जन्म की खुशी में मनाया जाता है। यह एक तरह से जीवन के चक्र और पुनर्जन्म का उत्सव है।
जैन धर्म के अनुसार, होली का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है मैत्री भाव। इस दिन लोग अपने सारे गिले-शिकवे भुला देते हैं और एक-दूसरे के प्रति क्षमा और प्रेम व्यक्त करते हैं। यह हमें सिखाता है कि रिश्तों में माफी और प्यार सबसे ऊपर है।
यह त्योहार विज्ञान, मनोविज्ञान और हमारी प्राचीन परंपराओं का एक अद्भुत संगम है। जब हम किसी पर रंग डालते हैं, तो यह सिर्फ रंग नहीं होता, बल्कि उनके प्रति हमेशा प्यार और स्नेह बरसाने का वादा होता है। वैज्ञानिक रूप से देखें तो यह वसंत के आने और सर्दियों के जाने का उत्सव है। यह नई फसल और जीवन की ताजगी का स्वागत करता है।
पुराने समय में, लोग हल्दी, नीम और पलाश जैसे प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल करते थे। ये रंग सिर्फ सुंदर ही नहीं होते थे, बल्कि त्वचा के छिद्रों से शरीर में जाकर हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाते थे। रंगों का हमारे दिमाग पर भी गहरा असर पड़ता है।
लेकिन, आज के समय में, हम इस पवित्र त्योहार में कुछ ऐसी चीजें शामिल कर रहे हैं जो ठीक नहीं हैं। आधुनिकता की दौड़ में हमने इस त्योहार को थोड़ा बिगाड़ दिया है। इसलिए, आज मानवता की यही पुकार है कि हम होली को सारे गिले-शिकवे मिटाते हुए 'इको-फ्रेंडली' यानी पर्यावरण के अनुकूल बनाएं। हमें इस त्योहार को उसी पवित्रता और प्रेम के साथ मनाना चाहिए जैसा यह हमेशा से रहा है।