पौधों में संवेदना

नवभारत टाइम्स

1960 के दशक में क्लेव बैकस्टर ने एक प्रयोग किया। उन्होंने एक पौधे पर पॉलीग्राफ यंत्र लगाया। एक व्यक्ति ने पौधे को नष्ट किया। जब वह व्यक्ति कमरे में आया तो यंत्र में कंपन हुआ। इससे पता चला कि पौधा उस व्यक्ति को पहचान गया था। यह प्रयोग दर्शाता है कि पौधों में भी संवेदना होती है।

plants also have sentience shocking revelation from scientific experiment
1960 के दशक में अमेरिकी वैज्ञानिक क्लेव बैकस्टर ने एक चौंकाने वाला प्रयोग किया। उन्होंने दिखाया कि पौधे भी इंसानों की तरह महसूस कर सकते हैं और किसी खास व्यक्ति की मौजूदगी पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं। इस प्रयोग में, एक पौधे को नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति की पहचान पौधे की प्रतिक्रिया से हुई, जिससे यह साबित हुआ कि संवेदनाएं सिर्फ इंसानों तक ही सीमित नहीं हैं।

वैज्ञानिक क्लेव बैकस्टर ने 1960 के दशक में एक अनोखा प्रयोग किया। उन्होंने कागज के 6 टुकड़े तैयार किए। इनमें से 5 को खाली छोड़ दिया गया, लेकिन एक पर्ची पर लिखा था, ‘इस कमरे में रखे पौधों में से एक को उखाड़कर नष्ट कर देना है और पैरों से रौंद देना है।’ इसके बाद, 6 लोगों की आंखों पर पट्टी बांधी गई और उन्हें एक-एक पर्ची दी गई। जिस व्यक्ति को वह लिखी हुई पर्ची मिली, उसने कमरे में रखे एक पौधे को उखाड़कर पैरों से कुचल दिया। बाकी 5 लोग इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि क्या हुआ है। बैकस्टर को भी यह नहीं पता था कि किस व्यक्ति ने पौधे को नुकसान पहुंचाया है।
कुछ समय बाद, बैकस्टर ने वहां रखे एक पौधे पर पॉलीग्राफ मशीन (यह मशीन इंसानों की शारीरिक प्रतिक्रियाओं को मापती है, जैसे दिल की धड़कन और पसीना आना) को जोड़ा। फिर उन्होंने उन 6 लोगों को एक-एक करके कमरे में बुलाया। जब पहले 5 लोग कमरे में आए, तो पौधे से जुड़ी मशीन में कोई खास हलचल नहीं हुई। लेकिन जैसे ही वह व्यक्ति कमरे में दाखिल हुआ जिसने पौधे को नष्ट किया था, मशीन पर तेज कंपन दर्ज होने लगे। ऐसा लगा मानो पौधे ने उस व्यक्ति को पहचान लिया हो। उस व्यक्ति की मौजूदगी से ही पौधे की अंदरूनी प्रतिक्रिया सामने आ गई। पौधे की इस प्रतिक्रिया को देखकर बैकस्टर समझ गए कि इसी व्यक्ति ने पौधे को रौंदा और नष्ट किया है।

इस प्रयोग से यह बात साबित हुई कि पौधों में भी महसूस करने की क्षमता होती है। वे इंसानों की तरह ही किसी खास व्यक्ति की मौजूदगी पर प्रतिक्रिया दे सकते हैं। यह प्रयोग इस धारणा को चुनौती देता है कि संवेदनाएं केवल मनुष्यों तक ही सीमित हैं। यह दिखाता है कि प्रकृति में जीवन के बीच एक गहरा जुड़ाव है, जिसे हम अभी पूरी तरह से समझ नहीं पाए हैं।