बजट सत्र में विदेश नीति का मुद्दा रहेगा गरम!

नवभारत टाइम्स

संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण विदेश नीति के मुद्दों पर गरमाएगा। इस्राइल और अमेरिका के ईरान पर हमले से क्षेत्र में तनाव बढ़ा है। विपक्ष भारत की विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता पर सरकार से सवाल पूछेगा। यह मुद्दा संसद के साथ-साथ आगामी विधानसभा चुनावों में भी उठेगा।

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संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण 9 मार्च से शुरू होने वाला है, और इस बार भी विदेश नीति ही सबसे बड़ा मुद्दा बनने वाली है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्राइल दौरे और उसके तुरंत बाद इस्राइल-अमेरिका के ईरान पर हमले ने पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है। विपक्ष इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की पूरी तैयारी में है, खासकर भारत की ' रणनीतिक स्वायत्तता ' पर सवाल उठाते हुए। ईरान के राष्ट्रपति की मौत पर भारत के राजकीय शोक को भी विपक्ष ने रिश्तों की संवेदनशीलता का हवाला देते हुए उठाया है। यह पूरा मामला अब सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंच तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर घरेलू राजनीति का भी एक बड़ा मुद्दा बन गया है।

संसद का बजट सत्र अपने दूसरे चरण में प्रवेश करने जा रहा है, जो अगले हफ्ते 9 मार्च से शुरू होगा। इस बार भी सदन में सबसे ज्यादा गरमागरमी विदेश नीति को लेकर ही होने की उम्मीद है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हाल ही में इस्राइल के दौरे पर गए थे, जहाँ उन्होंने इस्राइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू को अपना दोस्त बताया। पिछले कुछ सालों में भारत और इस्राइल के बीच रणनीतिक, रक्षा और तकनीकी सहयोग में काफी तेज़ी आई है। वहीं, भारत ने ईरान के साथ भी अपने संबंधों को हमेशा अहमियत दी है।
ईरान में हाल ही में हुई राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत के बाद भारत ने एक दिन का राजकीय शोक घोषित किया था और राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका दिया था। यह कदम भारत और ईरान के बीच गहरे और संवेदनशील रिश्तों को दर्शाता है। 2016 में पीएम मोदी ईरान गए थे, और वे 15 सालों में ईरान जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे।

बजट सत्र के पहले चरण में ही विपक्ष ने भारत-अमेरिका डील को लेकर सरकार पर सवाल उठाए थे। विदेश नीति पर चर्चा की मांग करते हुए विपक्ष ने आरोप लगाया था कि सरकार अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता कर रही है। उस समय सदन में काफी नारेबाजी हुई थी और कामकाज में भी बाधा आई थी।

अब सत्र के दूसरे चरण से ठीक पहले, इस्राइल और अमेरिका के ईरान पर हमले ने पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की मौत को लेकर भी राजनीतिक बहस तेज़ हो गई है। विपक्ष इस मुद्दे पर भी सरकार से सवाल पूछ रहा है। खास तौर पर, पीएम के इस्राइल दौरे से लौटने के तुरंत बाद इस क्षेत्र में हुई सैन्य कार्रवाई की टाइमिंग पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। विपक्ष यह जानना चाहता है कि क्या भारत को इस बारे में पहले से कोई जानकारी थी।

इसके अलावा, लगातार यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत की पारंपरिक 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति अब कमजोर हो गई है। क्या इस्राइल और अमेरिका के साथ भारत की नज़दीकियां एकतरफा हो रही हैं? विपक्ष भारत की इस्राइल और फलस्तीन को लेकर अपनाई गई नीति पर भी सरकार पर हमलावर है। यह सवाल भी संसद में उठ सकता है कि मौजूदा हालात का भारत और ईरान के संबंधों पर क्या असर पड़ेगा।

सरकार के सामने इस समय कूटनीतिक और घरेलू, दोनों ही स्तरों पर एक बड़ी चुनौती है। कूटनीतिक स्तर पर, भारत को इस्राइल, अमेरिका और ईरान के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाना होगा। एक तरफ, भारत अमेरिका और इस्राइल के साथ अपने सामरिक, रक्षा और तकनीकी सहयोग को बढ़ा रहा है। दूसरी तरफ, ईरान भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और मध्य एशिया तक पहुँच के लिहाज़ से बहुत महत्वपूर्ण है।

हालांकि, विपक्ष की पूरी कोशिश रहेगी कि वे सरकार को विदेश नीति की विफलता के मुद्दे पर घेर सकें। आने वाले महीनों में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में, विदेश नीति का मुद्दा सिर्फ संसद तक ही सीमित नहीं रहेगा। विपक्ष इसे अपनी जनसभाओं और राजनीतिक अभियानों में भी उठाएगा। कांग्रेस पार्टी, बीजेपी की विदेश नीति और उसके घरेलू असर के मुद्दे को भुनाने की कोशिश कर सकती है। वहीं, बीजेपी शुरू से ही 'मजबूत नेतृत्व' और 'वैश्विक प्रतिष्ठा' का नैरेटिव बनाती रही है। आने वाले दिनों में संसद का माहौल यह बताएगा कि विदेश नीति अब केवल अंतरराष्ट्रीय मंच का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह भारतीय राजनीति का भी एक केंद्रीय मुद्दा बन चुकी है।