आयोग की चुनौती

नवभारत टाइम्स

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने तैयारियों का जायजा लिया है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर विवाद बढ़ा है। विपक्ष ने बड़े पैमाने पर नाम काटने का आरोप लगाया है। पश्चिम बंगाल में आयोग और सत्ताधारी दल के बीच टकराव देखा गया है।

आयोग की चुनौती
चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है, लेकिन इन चुनावों में मतदाताओं की संख्या इतनी बड़ी है कि यह अमेरिका की कुल आबादी से भी ज्यादा है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार ने इस बात पर गर्व जताया कि 17.4 करोड़ से ज्यादा मतदाता इस बार वोट डालेंगे, जो ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी और कनाडा जैसे देशों की कुल आबादी से भी ज्यादा है। हालांकि, इतनी बड़ी संख्या के बावजूद, चुनाव आयोग के लिए सबसे बड़ी चुनौती मतदाताओं की सूची को सही रखना है। हाल ही में Special Intensive Revision (SIR) यानी मतदाताओं की सूची को फिर से जांचने की प्रक्रिया विवादों में घिरी रही है। विपक्ष का आरोप है कि SIR के दौरान बड़े पैमाने पर पात्र मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं।

पश्चिम बंगाल में तो चुनाव आयोग और राज्य की सत्ताधारी TMC पार्टी के बीच इस मुद्दे पर सीधा टकराव देखने को मिला है। जब मुख्य चुनाव आयुक्त कोलकाता में चुनाव की तैयारियों का जायजा लेने पहुंचे थे, तो उन्हें विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद मतदाताओं के नाम काटे जाने का आरोप लगाते हुए धरना दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के एक अपीलीय ट्रिब्यूनल बनाने के निर्देश के बाद उन्होंने अपना धरना खत्म किया। पश्चिम बंगाल में SIR प्रक्रिया के तहत लगभग 63.66 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं और 60 लाख से ज्यादा नामों पर अभी भी विचार चल रहा है।
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर इस समय सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जाना इस बात का साफ संकेत है कि विपक्ष का भरोसा आयोग पर से पूरी तरह टूट चुका है। यह प्रस्ताव TMC की ओर से लाया गया था और इस पर 193 सांसदों के हस्ताक्षर थे। इससे यह पता चलता है कि कम से कम इस मुद्दे पर विपक्ष एकजुट नजर आ रहा है। इस प्रस्ताव में बिहार में हुई SIR प्रक्रिया का भी जिक्र है और यह आरोप भी लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त एक खास पार्टी के हित में काम कर रहे हैं। अब यह मायने नहीं रखता कि यह प्रस्ताव पास होगा या नहीं, बल्कि यह ज्यादा महत्वपूर्ण है कि चुनाव आयोग इन चुनावों के दौरान अपनी निष्पक्षता कैसे साबित करता है।

चुनाव आयोग की यह जिम्मेदारी है कि सभी को चुनाव में बराबर मौके मिलें और किसी के साथ कोई पक्षपात न हो। एक संवैधानिक संस्था होने के नाते यह बहुत जरूरी है कि आयोग की मंशा पर कोई सवाल न उठाए। कभी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को लेकर विवाद होते हैं, तो कभी SIR जैसी प्रक्रियाएं विवादों में घिर जाती हैं। ये विवाद चुनाव आयोग के हित में बिल्कुल नहीं हैं।

चुनाव आयोग का काम निष्पक्ष रहना है। जब भी कोई विवाद होता है, तो लोगों का भरोसा कम हो जाता है। SIR का मतलब है कि चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करता है कि सूची में केवल वही लोग हों जो वोट देने के योग्य हैं। कोई भी ऐसा व्यक्ति वोट न दे सके जो योग्य नहीं है, और कोई भी योग्य व्यक्ति वोट देने से वंचित न रह जाए। लेकिन पश्चिम बंगाल में जो हुआ, उससे लोगों को लगा कि कई योग्य लोगों के नाम काट दिए गए।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस पर कड़ा विरोध जताया। उन्होंने कहा कि यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। जब चुनाव आयोग के अधिकारी तैयारियों का जायजा लेने आए, तो उन्होंने विरोध प्रदर्शन किया। यह दिखाता है कि लोगों को कितना गुस्सा था। सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा कि वे एक ट्रिब्यूनल बनाएंगे, तब जाकर मामला थोड़ा शांत हुआ।

यह सिर्फ पश्चिम बंगाल की बात नहीं है। बिहार में भी SIR को लेकर सवाल उठे थे। विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग एक तरफा काम कर रहा है। यह आरोप बहुत गंभीर है। अगर विपक्ष को लगता है कि चुनाव आयोग किसी पार्टी का साथ दे रहा है, तो यह निष्पक्ष चुनाव के लिए बहुत बड़ा खतरा है।

चुनाव आयोग को अपनी छवि सुधारनी होगी। उन्हें यह दिखाना होगा कि वे सभी पार्टियों के लिए बराबर हैं। EVM पर सवाल उठते रहते हैं। कभी-कभी लोग कहते हैं कि EVM से छेड़छाड़ हो सकती है। चुनाव आयोग को इन सवालों का जवाब देना चाहिए और लोगों को भरोसा दिलाना चाहिए कि चुनाव पूरी तरह से पारदर्शी और निष्पक्ष हैं।

जब चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, तो पूरा लोकतंत्र कमजोर होता है। इसलिए, यह बहुत जरूरी है कि चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता बनाए रखे और किसी भी तरह के विवाद से बचे। तभी लोग चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा कर पाएंगे और वोट देने के लिए आगे आएंगे। यह सिर्फ एक चुनाव की बात नहीं है, बल्कि यह देश के भविष्य की बात है।