जब ईरान को इस्राइल ने बेचे हथियार

नवभारत टाइम्स

ईरान और इस्राइल के रिश्ते कभी गहरे दोस्त के थे। दोनों देशों के बीच संबंध भू-राजनीति और राष्ट्रीय हितों पर आधारित रहे हैं। इस्लामिक क्रांति के बाद रिश्ते बिगड़े। युद्ध के दौरान भी इस्राइल ने ईरान को हथियार बेचे। अमेरिकी नीतियों ने भी ईरान के अलगाव को बढ़ाया। यह अदावत धर्म की वजह से नहीं है।

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ट्रिटा पारसी की किताब ‘Treacherous Alliance’ से पता चलता है कि कभी इजराइल और ईरान पर्दे के पीछे दोस्त थे, लेकिन भू-राजनीतिक हित और राष्ट्रीय स्वार्थों ने उनके रिश्तों में कड़वाहट ला दी, जिससे युद्ध भी हुए। यह किताब इजराइल, ईरान और अमेरिका के शीर्ष अधिकारियों से बातचीत पर आधारित है और बताती है कि यह वैचारिक लड़ाई नहीं, बल्कि सत्ता और प्रभाव की जंग है। किताब के अनुसार, शाह के शासनकाल में दोनों देश करीब थे, खुफिया जानकारी साझा करते थे, तेल और हथियार का व्यापार करते थे और मिसाइल बनाने की योजना पर भी काम कर रहे थे। लेकिन 1979 की ईरानी क्रांति के बाद यह दोस्ती टूट गई, जब खुमैनी ने इजराइल को 'छोटा शैतान' करार दिया। इसके बावजूद, ईरान-इराक युद्ध के दौरान इजराइल ने गुप्त रूप से ईरान को हथियार बेचे, क्योंकि वह सद्दाम हुसैन को ज्यादा बड़ा खतरा मानता था। 9/11 के बाद अमेरिकी नीतियों ने भी ईरान के अलगाव को बढ़ाया, जब जॉर्ज बुश की सरकार ने ईरान के सहयोग प्रस्तावों को ठुकरा दिया, जिससे ईरान परमाणु हथियार की ओर बढ़ा।

इजराइल और ईरान: दोस्ती से दुश्मनी तक का सफर
ट्रिटा पारसी की किताब ‘Treacherous Alliance’ इजराइल और ईरान के जटिल रिश्तों की परतें खोलती है। यह किताब बताती है कि कैसे कभी ये दोनों देश पर्दे के पीछे एक-दूसरे के दोस्त हुआ करते थे। लेकिन समय के साथ, भू-राजनीतिक समीकरण और राष्ट्रीय हित बदलते गए, जिसने उनके रिश्तों में कड़वाहट घोल दी और नौबत युद्ध तक आ गई। आज भी, अमेरिका के साथ मिलकर इजराइल ईरान के खिलाफ एक और जंग की तैयारी में है।

पारसी ने इस किताब को लिखने के लिए इजराइल, ईरान और अमेरिका के कई बड़े अधिकारियों से बात की है। उनकी मानें तो, बाहर से भले ही यह लड़ाई वैचारिक या धार्मिक लगे, लेकिन सच्चाई कुछ और है। असल में, इन दोनों देशों के रिश्ते हमेशा से भू-राजनीति और अपने-अपने राष्ट्रीय हितों से तय होते रहे हैं।

शाह के दौर की दोस्ती: खुफिया जानकारी से लेकर मिसाइल प्रोजेक्ट तक

किताब में बताया गया है कि जब ईरान में शाह मोहम्मद रेजा पहलवी का राज था, तब इजराइल और ईरान के बीच काफी गहरी दोस्ती थी। उस समय, दोनों देशों ने मिलकर इराक और मिस्र जैसे देशों के खिलाफ एक साथ काम किया था। इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद और ईरान की खुफिया एजेंसी SAVAK, इस क्षेत्र में सोवियत संघ से आ रहे हथियारों की जानकारी आपस में साझा करती थीं।

इतना ही नहीं, इजराइल उस वक्त ईरान से तेल खरीदता था और बदले में उसे हथियार देता था। कृषि के क्षेत्र में भी इजराइल ईरान की मदद करता था। 1973 में जब अरब देशों ने तेल की बिक्री रोक दी थी, तब इजराइल के लिए ईरान तेल का एक अहम जरिया बना था। पारसी के अनुसार, उस दौर में दोनों देशों ने मिलकर 'प्रोजेक्ट फ्लावर' नाम से एक मिसाइल बनाने की योजना भी शुरू की थी।

इस दोस्ती की एक खास वजह भी थी। इजराइल, अरब देशों के बीच एक यहूदी देश होने के नाते अलग-थलग महसूस करता था। वहीं, ईरान एक ताकतवर गैर-अरब देश था। इस साझा स्थिति ने उन्हें करीब ला दिया था।

क्रांति के बाद कड़वाहट: 'छोटा शैतान' और गुप्त हथियार सौदे

लेकिन यह दोस्ती 1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति के बाद टूट गई। शाह को गद्दी छोड़नी पड़ी और अयातुल्लाह खुमैनी ईरान के सुप्रीम लीडर बन गए। खुमैनी ने आते ही इजराइल को 'छोटा शैतान' घोषित कर दिया, जबकि अमेरिका उनके लिए 'बड़ा शैतान' था।

हालांकि, इस्लामिक रिपब्लिक बनने के बाद भी ईरान और इजराइल के रिश्ते पूरी तरह खत्म नहीं हुए थे। पारसी लिखते हैं कि 1980 से 1988 के बीच जब ईरान का इराक के साथ युद्ध चल रहा था, तब इजराइल ने गुप्त रूप से ईरान को 50 करोड़ डॉलर के हथियार बेचे थे। इन हथियारों में अमेरिका में बने F-4 लड़ाकू विमानों के पुर्जे भी शामिल थे। उस समय इजराइल को सद्दाम हुसैन कहीं ज्यादा खतरनाक लग रहे थे, इसलिए उसने ईरान की मदद करना बेहतर समझा।

अमेरिकी नीतियों का असर: अलगाव और परमाणु दौड़

पारसी का यह भी मानना है कि अमेरिकी नीतियों ने भी ईरान के अलगाव और उससे दुश्मनी को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने लिखा है कि 9/11 के आतंकवादी हमलों के बाद, ईरान ने अल कायदा के बारे में जानकारी देने की पेशकश की थी। उसने परमाणु हथियार बनाने को लेकर पश्चिम और इजराइल की चिंताओं को दूर करने का प्रस्ताव भी दिया था।

लेकिन उस समय अमेरिका में जॉर्ज बुश की सरकार थी और उसने ईरान के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। किताब में बताया गया है कि बुश सरकार में ईरान विरोधी और इजराइल के समर्थक काफी मजबूत थे। पारसी लिखते हैं कि इजराइल की अमेरिका के साथ लॉबिंग के कारण ईरान को एक ऐसे खतरे के रूप में पेश किया जाने लगा, जिसे खत्म करना बहुत जरूरी था।

2002 में बुश ने ईरान को 'दुष्ट देशों' की सूची में भी शामिल कर लिया था। इससे इस्लामिक रिपब्लिक की दूरी अमेरिका से और बढ़ गई। इसके बाद, ईरान ने परमाणु हथियार बनाने की दिशा में गंभीरता से प्रयास शुरू कर दिए, हालांकि वह अभी तक इसमें सफल नहीं हो पाया है।

धर्म नहीं, भू-राजनीति है असली वजह

किताब में यह भी लिखा गया है कि शीत युद्ध खत्म होने के बाद ईरान का अलगाव और बढ़ गया। कुल मिलाकर, इस किताब में यह साफ किया गया है कि इजराइल और ईरान के बीच की यह दुश्मनी किसी धर्म की वजह से नहीं है, बल्कि इसके पीछे भू-राजनीतिक कारण और राष्ट्रीय हित सबसे बड़े कारक हैं।