Nanalal Dalpatram Kavi An Example Of Truth And Self respect A Great Poet Of Gujarati Literature
कविता का सम्मान
नवभारत टाइम्स•
गुजराती साहित्य के महान कवि नानालाल दलपतराम कवि का जन्म 1877 में हुआ था। उनकी प्रसिद्ध रचना 'वसंतोत्सव' प्रेम और सौंदर्य का बखान करती है। उन्होंने कालिदास की कृतियों का अनुवाद भी किया। एक बार दरबार में राजा की प्रशंसा में कविता सुनाने के अनुरोध पर उन्होंने कहा कि कविता सत्य और सौंदर्य की अभिव्यक्ति है।
गुजराती साहित्य के महान कवि नानालाल दलपतराम का जन्म 16 मार्च 1877 को अहमदाबाद में हुआ था। युवावस्था से ही उनकी प्रतिभा चमकने लगी थी। उन्होंने प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य पर आधारित प्रसिद्ध काव्य रचना ‘ वसंतोत्सव ’ लिखी। साथ ही, उन्होंने कालिदास की ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ और ‘मेघदूत’ का गुजराती में अनुवाद किया। भगवद्गीता और कई उपनिषदों को भी उन्होंने गुजराती पाठकों के लिए आसान बनाया। एक बार बड़ौदा रियासत के दरबार में राजा की प्रशंसा में कविता सुनाने के अनुरोध पर, नानालाल ने विनम्रता से कहा कि कविता केवल खुश करने के लिए नहीं, बल्कि सत्य और सौंदर्य को व्यक्त करने के लिए होती है। उनकी यह बात सच्ची प्रतिभा को दर्शाती है, जो सत्य और स्वाभिमान के साथ खड़ी रहती है।
नानालाल दलपतराम कवि को गुजराती साहित्य में बहुत सम्मान मिलता है। उनका जन्म अहमदाबाद में 16 मार्च 1877 को हुआ था। कम उम्र में ही उनकी काबीलियत लोगों को दिखने लगी थी। उनकी एक बहुत मशहूर कविता है ‘वसंतोत्सव’। यह कविता प्रकृति, प्यार और खूबसूरती को बहुत ही प्यारे ढंग से बताती है।नानालाल ने संस्कृत के बड़े कवि कालिदास की दो मशहूर रचनाओं, ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ और ‘मेघदूत’ का गुजराती भाषा में अनुवाद किया। इसके अलावा, उन्होंने भगवद्गीता और कई उपनिषदों को भी गुजराती लोगों के लिए सुलभ बनाया, ताकि वे इन्हें आसानी से पढ़ सकें और समझ सकें।
एक बार की बात है, उन्हें बड़ौदा स्टेट की गायकवाड़ रियासत के दरबार में बुलाया गया। उस समय यह आम बात थी कि दरबार में राजा की तारीफ में कविता सुनाई जाए। जब उनसे ऐसा करने को कहा गया, तो नानालाल ने बड़े ही अदब से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कविता का मकसद सिर्फ किसी को खुश करना नहीं होता। कविता तो सच और खूबसूरती को बताने के लिए होती है। अगर कोई कवि सिर्फ तारीफ पाने के लिए लिखता है, तो उसकी लिखी हुई चीज़ का मोल कम हो जाता है।
नानालाल की यह बात सुनकर दरबार में कुछ देर के लिए एकदम सन्नाटा छा गया। यह किस्सा हमें एक बड़ी सीख देता है। असली काबीलियत वही होती है जो सच का साथ दे और अपने आत्मसम्मान पर अड़ी रहे। यह घटना दिखाती है कि सच्ची कला सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि सच्चाई और स्वाभिमान की अभिव्यक्ति है।