इसलिए अहम हैं होलसेल आंकड़े

नवभारत टाइम्स

आरबीआई रेपो रेट तय करते समय होलसेल महंगाई से ज्यादा खुदरा महंगाई पर ध्यान देता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें होलसेल महंगाई को बढ़ाएंगी। यह लागत कारखानों से खुदरा बाजार तक पहुंचेगी। इससे खुदरा महंगाई पर असर पड़ेगा। खुदरा महंगाई फरवरी में 3.2% तक पहुंच गई है। यह स्थिति आगे भी बनी रह सकती है।

why wholesale figures are important impact on rbi decisions and inflation
आरबीआई (RBI) रेपो रेट तय करते समय थोक महंगाई ( Wholesale Inflation ) की बजाय खुदरा महंगाई ( Retail Inflation ) को ज्यादा अहमियत देता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, जो 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं, थोक महंगाई पर ज्यादा असर डालेंगी। इसका सीधा असर कारखानों में बनने वाली चीजों की लागत पर पड़ेगा, जो बाद में खुदरा कीमतों में बढ़कर खुदरा महंगाई को बढ़ाएगी। फरवरी में खुदरा महंगाई पहले ही बढ़कर 3.2% हो चुकी है।

थोक महंगाई सूचकांक (WPI) में प्राकृतिक गैस, पेट्रोलियम और कच्चे तेल का हिस्सा 10.4% है। वहीं, खुदरा महंगाई सूचकांक (CPI) में इनका योगदान सिर्फ 4.8% है। इसलिए, जब कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो थोक महंगाई पर इसका असर ज्यादा दिखाई देता है।
यह बढ़ी हुई लागत आखिर में ग्राहकों तक पहुंचती है। कारखानों में चीजें महंगी बनती हैं, तो दुकानदार भी उन्हें ज्यादा दाम पर बेचते हैं। इसी वजह से खुदरा महंगाई बढ़ती है। फरवरी में खुदरा महंगाई 3.2% तक पहुंच गई थी, जो चिंता का विषय है। आरबीआई (RBI) अपनी मौद्रिक नीति तय करते समय इसी खुदरा महंगाई को ध्यान में रखता है।