Bullet Train Speed In Classical Music Sajan Mishras New Journey And Youthful Enthusiasm
शास्त्रीय संगीत में आज बुलेट ट्रेन चल रही
Contributed by: पंडित साजन मिश्र|नवभारतटाइम्स.कॉम•
कोरोना की दूसरी लहर में राजन- साजन मिश्र की प्रसिद्ध जोड़ी टूट गई। प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित साजन मिश्र ने बड़े भाई पंडित राजन मिश्र को खोने के बाद न सिर्फ खुद को संभाला बल्कि बेटे स्वरांश के साथ नए युगल गायन की शुरुआत की। वह कहते हैं, 'भैया मेरे भीतर गा रहे हैं।' आलोक पराड़कर ने उनसे यह बातचीत की :
n पहले आप बड़े भाई पंडित राजन मिश्र के साथ गाते थे, आज बेटे स्वरांश मिश्र के साथ गा रहे हैं, कैसा अंतर महसूस होता है?जो आदर मैं राजन भैया को देता था, वह मेरे बड़े भाई थे, गुरु तुल्य भाई थे, आज वही स्थिति स्वरांश की है। वह अपने पिता के साथ, गुरु तुल्य पिता के साथ बैठकर हाजिरी लगा रहे हैं। बड़े भैया की स्वरांश पर कृपा रही है। वह कर रहे हैं, लगे हुए हैं, हो जा रहा है। संगीत में एक ऐसी ताकत है कि अगर आप इसे करते रहते हैं तो यह आपके मन के उद्वेग को भी नियंत्रित करता रहता है। करीब 55 वर्षों तक बड़े भैया के साथ गायन किया। वह तो अद्भुत पल था, लेकिन इधर पांच साल से स्वरांश जो मेरे साथ गा रहे हैं, वह भी मेरे लिए अद्भुत क्षण है और मैं इसका भी आनंद ले रहा हूं। स्वरांश, पंडित राजन मिश्र के शिष्य हैं और मेरे भी शिष्य हैं। हमारे पिता पंडित हनुमान प्रसाद मिश्र से भी स्वरांश ने गंडा बंधवाया था। जब मैं राजन भैया से इन्हें गंडा बंधवाने ले गया तो वह बोले कि पिता जी के बाद अब मुझे बांधने की क्या जरूरत है। तब मैंने कहा था कि आप भी बांधिए, मेरी इच्छा है। मुझे खुशी होती है और हमेशा यह अनुभूति होती है कि राजन भैया की उपस्थिति बनी हुई है।
n जब आप पंडित राजन मिश्र के साथ गाते थे तो उनकी एक नेतृत्वकारी भूमिका होती थी। आज स्वरांश के साथ गाते हुए आपकी भूमिका क्या होती है?
यह तो समय-काल है। हमारी और राजन भैया की साथ गाने की यात्रा 1968 से आरंभ हुई व 2021 तक चली। इतनी लंबी संगीत यात्रा वाले शायद ही कोई युगल गायक हुए हों। जोड़ी टूट जाती है, क्लेश आ जाते हैं, लेकिन हमारे बीच हमेशा प्रेम रहा।
n संगीत की इस इतनी लंबी यात्रा में आप हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में क्या परिवर्तन देखते हैं?
एक बड़ा परिवर्तन यह आया है कि पहले अधेड़ उम्र के और बुजुर्ग लोग ही शास्त्रीय संगीत सुनने आते थे। आज बड़ी संख्या में युवा भी जुड़ रहे हैं। यह बहुत शुभ संकेत है। हर जगह युवाओं की तादाद बढ़ रही है, यह देखकर खुशी होती है। आज दर्शक वर्ग मिश्रित है। लेकिन, इससे यह भी हुआ है कि शास्त्रीय संगीत को समझाने का कलाकारों का दायित्व भी बढ़ गया है। जो नहीं समझ पा रहे हैं, उन्हें समझाने की कोशिश कलाकारों को करनी होगी, और यह कोशिश की भी जा रही है। इसके लिए एक और परिवर्तन यह जरूर हुआ है कि शास्त्रीय संगीत में जो गंभीरता थी, उसे युवाओं ने गति में बदल दिया है। आजकल सब कुछ बहुत तेजी में हो रहा है। हमारे प्रधानमंत्री ने कहा था कि हम बुलेट ट्रेन लेकर आएंगे। वह ट्रेन तो जब आएगी तब आएगी, लेकिन हमारे युवा कलाकार तो बुलेट ट्रेन बन गए हैं। बहुत स्पीड में भाग रहे हैं। हमारा कहना है कि सब चीज अनुपात में होनी चाहिए, जैसे भोजन में होती है।
n लेकिन बनारस का आपका संगीत तो बहुत ठहराव और सुकून का संगीत है?
हमारा जो कर्तव्य है, हम जिस परंपरा से आ रहे हैं, उसे जीने की कोशिश करते हैं। राजन-साजन मिश्र का जो गायन हुआ उसमें हमारे पिता पंडित हनुमान प्रसाद मिश्र और चाचा पंडित गोपाल मिश्र की तालीम है। उनका मानना था कि संगीत कर्णप्रिय भी हो और विद्वतापूर्ण भी। राग में त्रुटि नहीं होनी चाहिए, लय में कोई चूक नहीं होनी चाहिए। हमारे यहां कहा जाता है- गड़ंत, लड़ंत और उड़ंत। गड़ के गाओ, लड़ के गाओ और उड़ जाओ। इन तीनों चीजों का आनंद हम ले रहे हैं।
n बनारस से अब भी कितना लगाव बना हुआ है, क्योंकि आप लंबे समय से दिल्ली में रहते हैं?
संपूर्ण लगाव है, ऐसा लगाव है कि हम हर महीने-डेढ़ महीने पर बनारस पहुंच जाते हैं। लोग यह देखकर आश्चर्य करते है। हम अपनी ड्योढ़ी पर, गुरु की ड्योढ़ी पर नतमस्तक होते हैं, अपनी बैटरी चार्ज करते हैं और फिर दिल्ली लौट जाते हैं। बनारस से तो जुड़ाव है। वह जन्मस्थान है, कभी छूट नहीं सकता और यह कामना भी है कि हमारी आखिरी सांस भी बनारस में ही हो।
n लेकिन बनारस भी बहुत बदल गया है?
बदलेगा ही, हम खुद को ही देखें कि बचपन से अब तक हममें कितने परिवर्तन हो गए। पहले किस वेशभूषा में रहते थे और आज किसमें हैं। पहले आम-रोटी और मिठाई-रोटी खाते थे, आज पिज्जा-बर्गर और नूडल्स खा रहे हैं। पहले बादाम की ठंडाई पीते थे, आज कोल्ड ड्रिंक पीते हैं। यह प्राकृतिक चक्र है। आपको समाज के साथ चलना है तो इसे थोड़ा अपनाना भी पड़ता है।