कैसे रुके पुलिस-वकील टकराव

नवभारतटाइम्स.कॉम•
police lawyer conflict how to restore trust in the justice system
दिल्ली में पिछले दिनों पुलिस और वकीलों के बीच जो विवाद हुआ, उसने एक पुराना सवाल फिर हमारे सामने रख दिया है। जब इंसाफ की व्यवस्था की दो बड़ी संस्थाएं आपस में उलझ जाएं, तो रास्ता क्या हो? शाहदरा थाने में एक वकील घायल हुए। इसके बाद पुलिस के बर्ताव पर सवाल उठे और वकीलों ने विरोध किया। फिर कुछ पुलिसकर्मी भी अपने अफसरों के समर्थन में सामने आए। उन्होंने अपनी इज्जत और हिफाजत का मुद्दा उठाया। दोनों तरफ शिकायतें हैं, दोनों तरफ आरोप। ऐसे में पहली जरूरत यही है कि पूरे मामले की ईमानदार और निष्पक्ष जांच हो। जिम्मेदारी गवाही और सबूत से तय हो, गुस्से या दबाव से नहीं।

दोनों का नुकसान । पुलिस और वकील का काम अलग-अलग है। पुलिस कानून लागू करती है, लोगों की सुरक्षा करती है और अपराध पर लगाम रखती है। वकील आम आदमी के हक की पैरवी करता है और अदालत के जरिए उसे इंसाफ दिलाता है। पर दोनों जिस चीज की सेवा करते हैं, वह एक ही है- कानून का राज। इसलिए जब ये दोनों आमने-सामने आते हैं, तो उस भरोसे को चोट पहुंचती है, जिस पर पूरी व्यवस्था टिकी है।
कानून ऊपर । एक बात साफ होनी चाहिए, कानून से ऊपर कोई नहीं है। काला कोट पहन लेने से किसी को हाथ उठाने या बदसलूकी करने का अधिकार नहीं मिल जाता। और वर्दी भी किसी को मनमानी की इजाजत नहीं देती। पुलिस की ताकत कानून से आती है और वकील की आजादी संविधान से। जिस दिन हम इन दोनों को अपनी निजी जागीर समझने लगेंगे, उस दिन लोकतंत्र की नींव कमजोर होने लगेगी।

मुश्किल ड्यूटी । पुलिस का काम आसान नहीं। उनकी ड्यूटी दफ्तर की घड़ी देखकर खत्म नहीं होती। आराम कम मिलता है, साधन कम हैं, ट्रेनिंग भी कई बार अधूरी रह जाती है। पुलिस सुधार पर बने कई आयोगों और समितियों ने बरसों से इन बातों की ओर ध्यान दिलाया है, पर हालात में बहुत फर्क नहीं आया। इन कर्मियों को बेहतर प्रशिक्षण, मानसिक सेहत के लिए सहारा और काम करने का बेहतर माहौल चाहिए।

सीमाओं का सम्मान । जब किसी अफसर के सामने वकीलों का समूह हो या कोई भी भीड़, तो सिर्फ हुक्म देने से काम नहीं चलता। सुनने का सब्र और बात करने का सलीका चाहिए। हर विरोध को अपनी हेठी समझ लेना समझदारी नहीं है। वकीलों से भी यही उम्मीद है। विरोध करना हमारा हक है, और यह हक लोकतंत्र ने बड़ी कीमत देकर हासिल किया है। पर इसकी हद कानून तय करता है। जो पेशा रोज अदालत में कानून की दुहाई देता है, उसे सड़क पर भी उसी कानून का मान रखना होगा।

सबकी जवाबदेही । मैंने अपने लंबे पेशेवर जीवन में ऐसे बहुत से पुलिस अफसर देखे हैं, जिन्होंने कठिन से कठिन घड़ी में हिम्मत और संयम से काम लिया। उनकी कद्र होनी चाहिए, पर अगर किसी पर ज्यादती का आरोप लगे, तो उसकी जांच भी ईमानदारी से हो। यही पैमाना वकीलों पर भी लागू होता है। जवाबदेही से कोई पद-पेशा बरी नहीं है।

बात होती रहे । हर जिले में बार असोसिएशन और वरिष्ठ पुलिस अफसर नियमित रूप से मिलें, एक-दूसरे की दिक्कत सुनें। कोई विवाद हो, तो फौरन बात करने का एक तय रास्ता हो। पुलिस की ट्रेनिंग में अदालतों के कामकाज, वकील की भूमिका, मानवाधिकार और संविधान की दी हुई आजादी की समझ शामिल हो। बार एसोसिएशन भी अपने सदस्यों में जिम्मेदारी और संयम का माहौल बनाएं।

आज के समय में किसी घटना का अधूरा विडियो या एकतरफा बयान कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है और सच सामने आने से पहले ही राय बन जाती है। इसलिए हर पक्ष को कुछ कहने से पहले तथ्य परख लेने चाहिए। सोशल मीडिया पर फैसले सुनाने से बेहतर है कि जांच को अपना काम करने दिया जाए।

भरोसा जीतिए । सुप्रीम कोर्ट बार असोसिएशन का अध्यक्ष होने के नाते मैं साफ कहना चाहता हूं कि वकीलों की इज्जत, हिफाजत और पेशेवर आजादी से कोई समझौता नहीं हो सकता। पर पुलिसकर्मियों की इज्जत और सुरक्षा का सवाल भी उतना ही असली है। वर्दी हो या काला कोट, दोनों को सम्मान समाज के भरोसे से मिलता है। और भरोसा फर्ज निभाने से कमाया जाता है।

(वरिष्ठ अधिवक्ता और SC बार असोसिएशन के अध्यक्ष)

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