Ramayana In Diwali Memories Childhood Tradition And Life Lessons
दिवाली की यादों में घुली रामायण
नवभारतटाइम्स.कॉम•
बचपन से ही जिस पर्व का मुझे सबसे अधिक इंतजार रहता, वह दीपावली थी। जगमगाते दीपक, फुलझड़ियां, रॉकेट, मिठाइयां और घर में दोस्तों-रिश्तेदारों का आना-जाना। सब कुछ मिलकर इस त्योहार को खुशियों से भरा उत्सव बना देते। मैं आज से करीब 30-40 साल पहले की बात कर रही हूं, जब दीपावली का उल्लास कुछ अलग ही हुआ करता था। मेरे परिवार में इस पर्व को मनाने की एक खास परंपरा थी।
हर दिवाली पर परिवार का कोई एक सदस्य रामायण की कहानी सुनाता। कहानी होती थी राजा दशरथ के अपने बड़े बेटे राम को वनवास भेजने की, उनके साथ लक्ष्मण और सीता के वन जाने की और फिर उनके एक अनजान यात्रा पर निकल पड़ने की। मैं इन कहानियों में इस कदर डूब जाती थी कि खुद को उसी समय और परिवेश में महसूस करने लगती। मन में कई सवाल उठते थे। आखिर पिता की आज्ञा निभाने के लिए राम ने राजपाट छोड़ना कैसे स्वीकार किया होगा? सत्ता के लिए लोग क्या-क्या कर सकते हैं? कैकेयी जैसी मां ने आखिर ऐसा निर्णय क्यों लिया होगा कि परिवार के एक बेटे को घर से दूर जाना पड़ा? मुझे लगता था कि मां तो हमेशा अच्छी और उदार ही होती हैं। इसलिए कैकेयी का चरित्र मुझे उलझन में डाल देता था। उनके व्यवहार में मुझे ईर्ष्या और हठ दिखाई देता। उस उम्र में इन सवालों के जवाब खोजना आसान नहीं था। कई बार हमने दीपावली चाचा-चाची और भाई-बहनों के साथ मनाई। हमारे माता-पिता हमारे साथ नहीं रहते थे, लेकिन परिवार के दूसरे सदस्यों के साथ यह त्योहार अपनेपन से भरा रहता। कहानी सुनने और उस पर चर्चा करने के बाद हम सब फुलझड़ियां जलाते। यही वह पल होता था, जिसका सबसे अधिक इंतजार रहता था।कहानी सुनने के बाद उसका अर्थ भी समझाया जाता था। वनवास पूरा करके राम, सीता और लक्ष्मण के अयोध्या लौटने की कथा को सत्य की असत्य पर और प्रकाश की अंधकार पर विजय के रूप में देखा जाता था। दीप जलाकर उनका स्वागत करने की परंपरा भी इसी भाव से जुड़ी है। यह रामायण की एक ऐसी लोकप्रिय कथा है, जिसने हमारी सभ्यता और सामाजिक सोच को गहराई से प्रभावित किया है। आज उम्र और समझ के साथ जब इस कहानी पर विचार करती हूं तो इसके कई दूसरे पहलू भी दिखाई देते हैं। स्त्रीवादी चिंतन में कैकेयी के चरित्र, सत्ता, परिवार और स्त्री की भूमिका पर बहुत चर्चा हुई है। एक समय जिस कहानी को मैं केवल आदर्श और अनादर्श के रूप में देखती थी, आज उसमें कई सवाल और सामाजिक संदर्भ भी नजर आते हैं। (कवयित्री)