आरक्षण में समानता

नवभारतटाइम्स.कॉम•
supreme courts big decision on reservation rules for determining creamy layer changed step towards equality
ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने का आधार क्या होना चाहिए, इसे लेकर समय-समय पर बहस हुई है और सुझाव दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इस मामले को हल करने में मदद मिलेगी। अदालत ने साफ किया है कि सिर्फ माता-पिता की सैलरी के आधार पर किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में नहीं रखा जा सकता। इसके लिए उनके पद और सेवा की श्रेणी भी देखनी होगी।

दोहरा मानक । विवाद दो दशक से भी ज्यादा पुराना है। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों, विश्वविद्यालयों और निजी संस्थानों में काम करने वालों के वेतन को क्रीमी लेयर तय करने का आधार बना दिया गया था। वहीं, सरकारी कर्मचारियों के मामले में सैलरी के साथ पद और सेवा की श्रेणी भी देखी जाती है। विरोध इसी दोहरे पैमाने को लेकर था। सुप्रीम कोर्ट ने इस साल मार्च के अपने फैसले में भी इस अंतर को भेदभावपूर्ण माना था।
असमानता के कारण । जातिगत भेदभाव केवल आर्थिक पिछड़ेपन का मसला नहीं है। इसके साथ सामाजिक हैसियत, शिक्षा और सदियों से चली आ रही मान्यताएं भी जुड़ी हैं। इसलिए किसी परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर हो जाने भर से यह मान लेना ठीक नहीं कि उसके साथ जाति के आधार पर होने वाला अन्याय भी खत्म हो गया होगा। ऊंची आमदनी किसी व्यक्ति को उस सामाजिक पहचान से मुक्त नहीं करती, जिसके आधार पर उसे निशाना बनाया जाता है।

आगे की चुनौती । अदालत ने सरकार को फैसला लागू करने के लिए अतिरिक्त समय दिया है। उसने यह चिंता भी दूर कर दी कि अगर फैसले को पिछली तारीख से लागू किया गया, तो हजारों पुरानी नियुक्तियों, प्रमोशन पर असर पड़ेगा। अब सरकार को विभिन्न निजी और PSU संस्थानों के पदों की सरकारी सेवाओं से समकक्षता तय करने के लिए स्पष्ट नियम बनाने होंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो उम्मीदवारों को अधिकारों के लिए अदालतों का रुख करना पड़ेगा।

स्पष्ट नीति । सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से यह भी कहा है कि वह संविधान और अदालत के तय सिद्धांतों के अनुरूप आरक्षण व क्रीमी लेयर को लेकर अपनी पॉलिसी बना सकती है। इसकी जरूरत आरक्षण का मूल मकसद पूरा करने के लिए है। क्रीमी लेयर का सिद्धांत लाया गया, ताकि जो लोग कोटा का लाभ लेकर आगे बढ़ चुके हैं, वे पीछे वालों के लिए रास्ता दें। अगर लाभ एक ही हिस्से को मिलता रहा, तो दूसरा पिछड़ता जाएगा और असमानता की खाई बढ़ेगी। इसलिए मूल उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट नीति होनी चाहिए।

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