हर जीव जरूरी है, चाहे वह दिखे या नहीं दिखे

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every life is important the deep truth of lifes continuity from science and jain philosophy
ब्रूस लिप्टन अपनी पुस्तक ‘द बायोलॉजी ऑफ बिलीफ़’ में एक ऐसी धारणा पर प्रश्न उठाते हैं, जिसे आधुनिक मनुष्य लंबे समय से सच मानता आया है। यह धारणा है कि पृथ्वी पर मनुष्य नाम का प्राणी बाकी सभी जीवों से मूलतः अलग है, प्रकृति ने उसकी रचना ही कुछ विशेष ढंग से की है और वह सबसे श्रेष्ठ, सबसे बुद्धिमान और सबसे विकसित प्राणी है। लेकिन यदि हम जीवन को कोशिका के स्तर से समझने का प्रयास करें, तो यह धारणा उतनी सरल नहीं रह जाती। हमारे शरीर में खरबों कोशिकाएं हैं, लेकिन हमारा पूरा शरीर अंततः एक प्रारंभिक कोशिका से विकसित होता है। विकास की प्रक्रिया में कोशिकाएं विभाजित होती हैं, उनकी संख्या बढ़ती है और धीरे-धीरे वे अलग-अलग कार्यों के लिए विशिष्ट होती जाती हैं। इसी कार्य-विभाजन और संगठन से तंत्रिका तंत्र, पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र और शरीर की अन्य जटिल प्रणालियां विकसित होती हैं।

बैक्टीरिया से लेकर मनुष्य तक जीवन की निरंतरता
यदि हम इस दृष्टिकोण से देखें, तो एक कोशिकीय जीवों, जैसे बैक्टीरिया से लेकर मनुष्य तक जीवन की एक निरंतरता दिखाई देती है। बैक्टीरिया और मनुष्य के बीच जटिलता का बहुत बड़ा अंतर अवश्य है। एक बैक्टीरिया केवल एक कोशिका से बना होता है, जबकि मनुष्य का शरीर खरबों कोशिकाओं से मिलकर बना एक अत्यंत जटिल जैविक संगठन है। फिर भी बैक्टीरिया की एक अकेली कोशिका अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अनेक मूलभूत कार्य स्वयं करती है। अंतर मुख्यतः जटिलता और संगठन का है, जीवन की मूलभूत प्रवृत्ति का नहीं। एक बैक्टीरिया जीवन को बनाए रखने के लिए जिन मूलभूत प्रक्रियाओं का उपयोग करता है, उन्हीं का अत्यंत विकसित और जटिल रूप मनुष्य में दिखाई देता है। मनुष्य में यही प्रक्रियाएं अरबों-खरबों कोशिकाओं के समन्वय से एक अत्यंत जटिल व्यवस्था का रूप ले लेती हैं। यहीं से मनुष्य को प्रकृति से बिल्कुल अलग और स्वतंत्र मानने की धारणा पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता दिखाई देती है। मनुष्य प्रकृति से बाहर खड़ा हुआ कोई अलग अस्तित्व नहीं है, वह स्वयं प्रकृति और जीवन की उसी निरंतर प्रक्रिया का एक अत्यंत जटिल रूप है।

जैन दर्शन में जीवन की व्यापकता और अहिंसा

आधुनिक विज्ञान और जैन दर्शन के बीच अत्यंत महत्वपूर्ण संवाद दिखाई देता है। जैन परंपरा एक-इंद्रिय से लेकर पंचेंद्रिय जीवों तक जीवन के विभिन्न रूपों को स्वीकार करती है। हम सामान्य रूप से जमीन, घास या रास्ते को केवल एक निर्जीव सतह की तरह देखते हैं। घास पर बैठना विशेष बात नहीं है। लेकिन जैन परंपरा में घास या उसमें रहने वाले सूक्ष्मजीवों फंगस इत्यादि को भी कष्ट न पहुंचे, इसका ध्यान रखा जाता है। क्योंकि सूक्ष्मतम जीव हो अथवा मनुष्य, जीवन के दृष्टिकोण से दोनों समान है। यहां अहिंसा का अर्थ केवल यह नहीं है कि हम किसी मनुष्य की हत्या न करें। यदि मनुष्य को मारना हिंसा है तो किसी छोटे से जीव को नष्ट करना भी हिंसा है। जीव का आकार उसके जीवन के मूल्य को निर्धारित नहीं करता। (NBT)

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