Uttam Kshama Jainisms Most Important Festival And The Meaning Of Michchhami Dukkadam
क्षमा ही नहीं मांगना, मन से वैर भी मिटाना चाहिए
नवभारतटाइम्स.कॉम•
Prashant.Jain @timesofindia.com
जैन धर्म दुनिया की उन अनूठी धार्मिक परंपराओं में से एक है, जहां क्षमा के लिए एक ख़ास पर्व और परंपरा मौजूद है। खासकर जब पूरी दुनिया महाशक्तियों द्वारा जारी युद्ध के साए में जी रही है, तब इसका असर न सिर्फ लड़ाई में शामिल देशों पर हो रहा है, बल्कि भारत समेत तमाम दूसरे देशों की जनता भी युद्ध के चलते महंगाई समेत तमाम परेशानियों का सामना कर रही है। ऐसे में, जैन आगम में वर्णित ‘ उत्तम क्षमा ’ की अवधारणा और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाती है।जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण पर्व
आपने देखा होगा कि आजकल सोशल मीडिया पर ‘ मिच्छामी दुक्कडम ’ और ‘उत्तम क्षमा’ के मेसेज छाए हुए हैं। वहीं बड़े-बड़े नेताओं से लेकर सिलेब्रिटीज तक ‘मिच्छामी दुक्कडम’ के मेसेज सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं, तो कुछ लोग ‘ दशलक्षण पर्व ’ और ‘संवत्सरी’ की शुभकामनाएं भी दे रहे हैं। दरअसल, आजकल जैन धर्म के ‘दशलक्षण पर्व’ चल रहे हैं, जिन्हें कि ‘पर्यूषण पर्व’ भी कहा आता है। यह भाद्रपद माह के आखिरी दस दिनों में मनाया जाने वाला जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। भाद्रपद के महीने को जैन धर्म के अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। यह महीना जैन समुदाय के दिगंबर और श्वेतांबर दोनों सम्प्रदायों के लिए आत्मशुद्धि और सार्वभौम क्षमा को समर्पित होता है। इस दौरान जैन धर्म के सभी अनुयायी उपवास, तप और साधना में लीन रहते हैं।
क्षमा मांगने और क्षमा करने की बड़ी महत्ता
'खामेमि सव्व जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे, मिती मे सव्व भुए सू, वैरम मज्झ न केवई।' प्राकृत भाषा में लिखे गए इस श्लोक का अर्थ है, 'मैं सभी जीवों से क्षमा मांगता हूं, सभी जीव मुझे क्षमा करें, सभी प्राणियों के साथ मेरी मैत्री है, किसी से मेरा वैर नहीं है।' जैन आगम में वर्णित इस श्लोक के मुताबिक जैन धर्म में क्षमा मांगने और क्षमा करने दोनों की ही बड़ी महत्ता बताई गई है। श्वेतांबर जैन समुदाय में ‘पर्यूषण पर्व’ आठ दिनों का होता है, जिसका आखिरी दिवस ‘संवत्सरी’ के रूप में मनाया जाता है।
क्षमावाणी से होता है दशलक्षण का समापन
इस दिन श्वेतांबर जैन संप्रदाय के अनुयायी एक-दूसरे से ‘मिच्छामी दुक्कडम’ कहकर क्षमा प्रार्थना करते हैं। ‘मिच्छामि दुक्कडम’ प्राकृत भाषा का शब्द है। इसका अर्थ 'मेरे द्वारा जाने अनजाने में की गईं गलतियों के लिए मुझे क्षमा करें' होता है। ‘संवत्सरी’ के अगले दिन दिगम्बर जैन संप्रदाय के दस दिन के ‘दशलक्षण पर्व’ यानी कि ‘पर्यूषण पर्व’ शुरू होते हैं। इन दस दिनों में धर्म के दस लक्षणों- क्षमा, मार्दव (मान का अभाव), आर्जव (छल-कपट से दूर रहना), शुचिता (पवित्रता), सत्य, संयम, तप, त्याग, अकिंचन (सहजता और परिग्रह से दूर रहना) और ब्रह्मचर्य (सदाचार) की आराधना की जाती है। इसलिए दिगम्बर जैन इन्हें 'दशलक्षण पर्व' कहते हैं। पर्यूषण पर्व का समापन भाद्रपद माह के अंत में 'अनंत चतुर्दशी' और 'क्षमावाणी पर्व' के साथ होता है।