पाकिस्तान में पत्रकार अहमद फरहाद की रिहाई की मांग, मानवाधिकार संगठन ने उठाया सवाल
पाकिस्तान में पत्रकार अहमद फरहाद की रिहाई की मांग, मानवाधिकार संगठन ने उठाया सवाल
NewsPoint•
डबलिन, 8 जुलाई: एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन, फ्रंट लाइन डिफेंडर्स, ने पाकिस्तान सरकार से पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता अहमद फरहाद को तुरंत रिहा करने और उनके खिलाफ लगाए गए सभी आरोप वापस लेने की मांग की है। संगठन का आरोप है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में फरहाद को उनकी पत्रकारिता और मानवाधिकारों के लिए किए जा रहे कामों की वजह से निशाना बनाया जा रहा है। फ्रंट लाइन डिफेंडर्स ने पीओके में हो रहे इस दमन की कड़ी निंदा की है। उनका कहना है कि यह कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न का एक बड़ा हिस्सा है जो सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हैं और मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए जवाबदेही मांगते हैं।
संगठन ने बताया कि अहमद फरहाद जैसे पत्रकार खास तौर पर मुश्किल में हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सरकार के दुष्प्रचार को चुनौती देते हैं और जमीनी हकीकत को स्वतंत्र रूप से लोगों तक पहुंचाते हैं। फ्रंट लाइन डिफेंडर्स के मुताबिक, पाकिस्तानी पुलिस ने 20 जून को पीओके के बाग शहर में फरहाद को तब पकड़ा था जब वे रावलाकोट में चल रहे जॉइंट आवामी एक्शन कमेटी (जेएएसी) के विरोध प्रदर्शन की खबर देकर अपने घर लौट रहे थे। संगठन का कहना है कि तब से उन्हें बिना किसी कानूनी वजह या गिरफ्तारी वारंट के बाग पुलिस थाने में रखा गया है।मानवाधिकार संगठन ने आगे कहा कि फरहाद पीओके में सामाजिक न्याय, मानवाधिकारों के उल्लंघन और लोगों के अधिकारों व न्याय के लिए चल रहे शांतिपूर्ण आंदोलनों के दमन से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग करते हैं। संगठन ने कहा, “अपने काम की वजह से उन्हें कई बार हिंसा का सामना करना पड़ा है। साल 2024 में उनका पहले अपहरण किया गया था, जो बाद में गिरफ्तारी में बदल गया। इसके अलावा, सरकार ने उन्हें अपराधी की तरह पेश करने और उनकी बदनामी करने की भी कोशिश की है।”
संगठन के अनुसार, हाल ही में फरहाद ने अपने मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए पीओके में जेएएसी द्वारा शुरू किए गए विरोध आंदोलन की रिपोर्टिंग की थी। इस रिपोर्टिंग के कारण पाकिस्तानी अधिकारियों पर अत्यधिक बल प्रयोग और दमन करने के आरोप लगे थे। संगठन ने बताया, “यह खबर मिली है कि हजारों प्रदर्शनकारियों को जन व्यवस्था बनाए रखने संबंधी अध्यादेश की धारा 3 के तहत गिरफ्तार किया गया है। यह कानून बिना किसी खास वजह के लोगों को हिरासत में रखने की इजाजत देता है और इसकी न्यायिक समीक्षा भी बहुत सीमित है।”
हिरासत में फरहाद की सुरक्षा को लेकर फ्रंट लाइन डिफेंडर्स ने गहरी चिंता जताई है। उन्होंने कहा, “पाकिस्तान में किसी भी तरह की असहमति की आवाज को लगातार दबाया जाता है। यहां तक कि उन लोगों को भी निशाना बनाया जाता है जो शांतिपूर्ण तरीके से न्याय और अधिकारों की मांग करते हैं। इसके अलावा, इंटरनेट बंद होने और क्षेत्र में आने-जाने पर लगाए गए प्रतिबंधों ने स्वतंत्र रिपोर्टिंग और मानवाधिकारों के उल्लंघन की असली स्थिति की जानकारी को लोगों तक पहुंचने से रोका है।”
फ्रंट लाइन डिफेंडर्स ने इस बात पर जोर दिया कि अहमद फरहाद जैसे पत्रकारों का काम बहुत महत्वपूर्ण है। वे उन आवाजों को उठाते हैं जिन्हें अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। उनके काम से ही लोगों को पता चलता है कि पीओके में क्या हो रहा है और वहां के लोगों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। संगठन ने पाकिस्तान सरकार से अपील की है कि वह फरहाद को तुरंत रिहा करे और उनके खिलाफ लगे सभी झूठे आरोप हटा दे।
संगठन ने यह भी कहा कि पीओके में अभिव्यक्ति की आजादी और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार छीना जा रहा है। जेएएसी जैसे संगठन लोगों के अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे हैं, लेकिन सरकार उन्हें दबाने की कोशिश कर रही है। इस तरह के दमन से न केवल लोगों का विश्वास कम होता है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का भी उल्लंघन है। फ्रंट लाइन डिफेंडर्स ने दुनिया भर के देशों और मानवाधिकार संगठनों से भी अपील की है कि वे इस मामले में पाकिस्तान पर दबाव बनाएं और अहमद फरहाद की रिहाई सुनिश्चित कराएं।
यह घटना पीओके में मानवाधिकारों की स्थिति पर भी सवाल उठाती है। जब पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम लोगों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। फ्रंट लाइन डिफेंडर्स का मानना है कि जब तक स्वतंत्र पत्रकारिता और मानवाधिकारों की रक्षा नहीं होगी, तब तक किसी भी समाज में न्याय और समानता नहीं आ सकती। इसलिए, अहमद फरहाद की रिहाई सिर्फ एक व्यक्ति की रिहाई नहीं, बल्कि पीओके में मानवाधिकारों की लड़ाई का एक महत्वपूर्ण कदम है।