चीन बना अमेरिका का रिसर्च कॉम्पिटिटर, व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में बड़ी चेतावनी
चीन बना अमेरिका का रिसर्च कॉम्पिटिटर, व्हाइट हाउस की रिपोर्ट में बड़ी चेतावनी
NewsPoint•
वॉशिंगटन, 22 जुलाई (आईएएनएस)। व्हाइट हाउस ने विज्ञान नीति पर एक नई रिपोर्ट जारी की है, जिसमें कहा गया है कि चीन रिसर्च पर खर्च के मामले में अमेरिका का एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी बन गया है। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि चीन सुनियोजित तरीके से महत्वपूर्ण और उभरती हुई टेक्नोलॉजी में अपनी क्षमताएं तेजी से बढ़ा रहा है। यह रिपोर्ट "साइंस: ए न्यू गोल्डन एज" नाम से जारी की गई है, जिसे व्हाइट हाउस के ऑफिस ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी पॉलिसी ने मंगलवार को प्रकाशित किया। यह रिपोर्ट अमेरिका के लगभग 200 अरब डॉलर के सालाना फेडरल रिसर्च और डेवलपमेंट सिस्टम को फिर से व्यवस्थित करने की एक योजना है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले बीस सालों में चीन का रिसर्च और डेवलपमेंट पर खर्च, जो पहले अमेरिका की तुलना में बहुत कम था, अब कुछ पैमानों पर 'परचेजिंग-पावर-एडजस्टेड' आधार पर अमेरिका के बराबर हो गया है। इस प्रतिस्पर्धा की तुलना शीत युद्ध के दौर से की गई है।
रिपोर्ट में अमेरिका, चीन और 27 देशों वाले यूरोपीय संघ की तुलना करते हुए एक चार्ट पेश किया गया है। इसमें कहा गया है, "पहली बार, अमेरिका को रिसर्च और डेवलपमेंट खर्च में 'परचेजिंग पावर पैरिटी' (पीपीपी)-एडजस्टेड आधार पर बराबरी का कॉम्पिटिटर मिला है।" दस्तावेज़ में बताया गया है कि चीन ने वैज्ञानिक रिसर्च की क्षमता को अपनी वैश्विक प्रतिस्पर्धा की रणनीति के केंद्र में रखा है। इसके लिए सबसे ऊंचे स्तर पर फैसले लिए जाते हैं और अलग-अलग क्षेत्रों में रिसर्च की कोशिशों में तालमेल बिठाया जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है, "समाज के सभी वर्गों को शामिल करने वाले इस नजरिए की वजह से चीन बुनियादी वैज्ञानिक रिसर्च के लिए संसाधन जुटा पाया है, राष्ट्रीय हित की अहम टेक्नोलॉजी में तेजी से आगे बढ़ पाया है और अपनी इनोवेशन प्रक्रिया में सुधार कर पाया है।"चीन की पहचान ऑटोनॉमस वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं (खुद काम करने वाली लैब) में भी एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी के तौर पर की गई है। इन प्रयोगशालाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स प्रयोगों को डिजाइन करने और उन्हें करने में मदद कर सकते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका ने अपनी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में प्रोटोटाइप ऑटोनॉमस सुविधाएं स्थापित की हैं, लेकिन "कनाडा और चीन समेत दूसरे देश तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।"
व्हाइट हाउस का यह ब्लूप्रिंट आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर, न्यूक्लियर फिशन और फ़्यूजन, एडवांस्ड कम्युनिकेशन, रोबोटिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और स्पेस सिस्टम पर फेडरल संसाधनों को केंद्रित करने की सलाह देता है। यह रिपोर्ट भारत या भारतीय वैज्ञानिक संस्थानों का कोई ज़िक्र नहीं करती है। दस्तावेज़ में बताए गए किसी भी राष्ट्रीय टेक्नोलॉजी मिशन में भारत को संभावित भागीदार के तौर पर भी नहीं पहचाना गया है। हालांकि, इसके साथ जारी वित्तीय वर्ष 2028 की रिसर्च प्राथमिकताओं से जुड़े मेमोरेंडम में फेडरल एजेंसियों को ऐसी फंडिंग पहलों पर विचार करने की अनुमति दी गई है, जिनमें "इंटरनेशनल पार्टनर" लागत साझा करते हैं। इसमें किसी खास देश का नाम नहीं लिया गया है और न ही उन वैज्ञानिक क्षेत्रों के बारे में बताया गया है जिनमें ऐसे अंतरराष्ट्रीय समझौते किए जाने चाहिए।
हालांकि रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय तुलनाओं में चीन का दबदबा दिखता है, लेकिन रिसर्च में सुधार या औद्योगिक प्रतिस्पर्धा के उदाहरण के तौर पर कई अन्य देशों का भी ज़िक्र किया गया है। यूनाइटेड किंगडम को अपने विज्ञान-फंडिंग सिस्टम को फिर से व्यवस्थित करने और 2024 में एक 'मेटासाइंस यूनिट' बनाने का श्रेय दिया जाता है। इस यूनिट का काम सबूत इकट्ठा करना, फंडिंग के नए तरीकों को आज़माना और पीयर-रिव्यू फैसलों की विश्वसनीयता की जांच करना है। नॉर्वे का उदाहरण दिया गया है कि कैसे उसने अपनी राष्ट्रीय रिसर्च काउंसिल को पोर्टफोलियो-आधारित सिस्टम के तहत व्यवस्थित किया है। इसमें बोर्ड सरकार की लंबी अवधि की रिसर्च योजना में पहचाने गए विषयों के आधार पर फंडिंग आवंटित करते हैं।
रिपोर्ट में यह भी याद दिलाया गया है कि कैसे 1980 के दशक तक जापानी निर्माताओं ने ग्लोबल मेमोरी-चिप मार्केट के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। उस चुनौती के कारण 1987 में 14 अमेरिकी सेमीकंडक्टर कंपनियों ने मिलकर सेमाटेक कंसोर्टियम बनाया, जिसे संघीय सरकार का समर्थन प्राप्त था।
व्यापक स्तर पर, यह दस्तावेज़ चेतावनी देता है कि अमेरिका में हुई खोजों का औद्योगिक लाभ अक्सर दूसरे देशों को मिला है। इसमें बताया गया है कि 'एक्सट्रीम अल्ट्रावायलेट लिथोग्राफी' मशीनें बनाने में सक्षम एकमात्र कंपनी का मुख्यालय यूरोप में है, जबकि लिथियम-आयन बैटरी सप्लाई चेन पर एशियाई कंपनियों का दबदबा है।
रिपोर्ट में दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी रिसर्च सिस्टम में किए गए बदलावों और 1945 में वैननेवर बुश की किताब "साइंस: द एंडलेस फ्रंटियर" के प्रकाशन का ज़िक्र किया गया है। इसमें तर्क दिया गया है कि बराबरी के प्रतिस्पर्धी के आने और एआई के उदय के कारण एक और बुनियादी पुनर्गठन की जरूरत है। जिन संघीय एजेंसियों के पास वित्त वर्ष 2026 में रिसर्च और डेवलपमेंट बजट के लिए कम से कम 3 बिलियन डॉलर की मंजूरी है, उन्हें 90 दिनों के भीतर कार्यान्वयन योजनाएं जमा करनी होंगी। उन्हें वित्त वर्ष 2028 के लिए अपने बजट प्रस्तावों में व्हाइट हाउस की प्राथमिकताओं को भी शामिल करना होगा।
यह रिपोर्ट अमेरिका के लिए एक वेक-अप कॉल है। चीन जिस तरह से रिसर्च और डेवलपमेंट में निवेश कर रहा है, वह अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी को एक महत्वपूर्ण हथियार के रूप में देखा है। वे न केवल बुनियादी रिसर्च में भारी निवेश कर रहे हैं, बल्कि उन टेक्नोलॉजी पर भी ध्यान केंद्रित कर रहे हैं जिनका भविष्य में बड़ा प्रभाव होगा।
उदाहरण के लिए, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के क्षेत्र में चीन की प्रगति बहुत तेज है। AI का उपयोग कई क्षेत्रों में किया जा सकता है, जैसे कि स्वायत्त वाहन, चिकित्सा निदान, और राष्ट्रीय सुरक्षा। चीन ने AI रिसर्च में भारी निवेश किया है और इस क्षेत्र में अग्रणी बनने की कोशिश कर रहा है। इसी तरह, क्वांटम कंप्यूटिंग एक और क्षेत्र है जहां चीन तेजी से आगे बढ़ रहा है। क्वांटम कंप्यूटिंग में वर्तमान कंप्यूटरों की तुलना में बहुत अधिक गणना शक्ति होगी और यह क्रिप्टोग्राफी, दवा खोज और सामग्री विज्ञान जैसे क्षेत्रों में क्रांति ला सकती है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चीन अपनी रिसर्च और डेवलपमेंट की कोशिशों में तालमेल बिठाने के लिए एक केंद्रीकृत दृष्टिकोण अपना रहा है। इसका मतलब है कि वे अपनी रिसर्च को राष्ट्रीय लक्ष्यों के साथ संरेखित कर रहे हैं और यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाए। यह अमेरिका के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है, जहां रिसर्च फंडिंग अक्सर खंडित होती है और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी हो सकती है।
रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया है कि अमेरिका ने अतीत में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजें की हैं, लेकिन अक्सर इन खोजों का औद्योगिक लाभ दूसरे देशों को मिला है। उदाहरण के लिए, लिथियम-आयन बैटरी, जो हमारे स्मार्टफोन और इलेक्ट्रिक कारों को शक्ति प्रदान करती है, का आविष्कार अमेरिका में हुआ था, लेकिन अब इसकी सप्लाई चेन पर एशियाई कंपनियों का दबदबा है। इसी तरह, 'एक्सट्रीम अल्ट्रावायलेट लिथोग्राफी' मशीनें, जो आधुनिक सेमीकंडक्टर चिप्स बनाने के लिए आवश्यक हैं, बनाने वाली एकमात्र कंपनी यूरोप में स्थित है।
यह रिपोर्ट अमेरिका को अपनी रिसर्च और डेवलपमेंट रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती है। इसमें सुझाव दिया गया है कि अमेरिका को उन प्रमुख टेक्नोलॉजी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो भविष्य में महत्वपूर्ण होंगी और इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना चाहिए। साथ ही, अमेरिका को अपनी राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं को मजबूत करने और वैज्ञानिक प्रतिभा को आकर्षित करने और बनाए रखने के लिए और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है।
रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व पर भी जोर दिया गया है, हालांकि यह स्पष्ट रूप से भारत का उल्लेख नहीं करता है। यह बताता है कि फेडरल एजेंसियों को ऐसी फंडिंग पहलों पर विचार करना चाहिए जिनमें "इंटरनेशनल पार्टनर" लागत साझा करते हैं। यह इंगित करता है कि अमेरिका भविष्य में अन्य देशों के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां साझा हित हैं।
संक्षेप में, यह रिपोर्ट अमेरिका के लिए एक चेतावनी है कि उसे विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने के लिए सक्रिय कदम उठाने होंगे। चीन की बढ़ती शक्ति को देखते हुए, अमेरिका को अपनी रिसर्च और डेवलपमेंट क्षमताओं को मजबूत करने और भविष्य की टेक्नोलॉजी में निवेश करने की आवश्यकता है ताकि वह वैश्विक मंच पर अग्रणी बना रह सके। यह रिपोर्ट अमेरिका के वैज्ञानिक समुदाय और नीति निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक दस्तावेज है, जो देश को भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने में मदद करेगा।