जम्मू कोर्ट ने बीसीसीआई के अध्यक्ष मिथुन मन्हास के खिलाफ एफआईआर की मांग खारिज की
जम्मू कोर्ट ने बीसीसीआई के अध्यक्ष मिथुन मन्हास के खिलाफ एफआईआर की मांग खारिज की
NewsPoint•
जम्मू में स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट ने बीसीसीआई के अध्यक्ष मिथुन मन्हास के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली एक अर्जी को खारिज कर दिया है। उन पर आरोप था कि उन्होंने अपनी जन्मतिथि में छेड़छाड़ की है ताकि वे एज-ग्रुप क्रिकेट में बढ़त हासिल कर सकें। यह मामला अगस्त 2023 का है, जब सुदर्शन मेहता, जो रिटायर्ड सीनियर डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस और जम्मू एंड कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (जेकेसीए) के पूर्व संयुक्त सचिव हैं, ने इस मामले में शिकायत दायर की थी।
मेहता ने आरोप लगाया था कि मन्हास ने राष्ट्रीय सब-जूनियर और जूनियर टूर्नामेंट में चयन के लिए दो अलग-अलग जन्मतिथियों का उपयोग किया। उन्होंने कहा कि एक ईमेल के आधार पर, जो महाराजा हरि सिंह एग्रीकल्चर कॉलेजिएट स्कूल से मिला था, मन्हास की जन्मतिथि 9 दिसंबर, 1977 दर्ज की गई थी। जबकि डीडीसीए की वेबसाइट पर उनकी जन्मतिथि 12 अक्टूबर, 1979 बताई गई थी। मेहता का कहना था कि इस बात की शिकायत करने के बाद भी नोवाबाद पुलिस स्टेशन और जम्मू के एसपी सिटी नॉर्थ ने कोई कार्रवाई नहीं की, जिससे उन्हें अदालत का दरवाजा खटखटाने पर मजबूर होना पड़ा।कोर्ट ने इस मामले में एक फैक्ट रिपोर्ट फ्रेम करने का आदेश दिया। इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि मन्हास की जन्मतिथि विभिन्न दस्तावेजों जैसे सीबीएसई मार्कशीट, पैन कार्ड, आधार कार्ड और ओएनजीसी के रिकॉर्ड में एक जैसी 12 सितंबर, 1977 दर्ज थी। रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया कि मन्हास ने किसी भी तरह की जालसाजी या धोखाधड़ी नहीं की। नतीजतन, उन्हें जूनियर क्रिकेट में कोई गलत फायदा नहीं मिला।
कोर्ट ने यह भी कहा, "यह बताना जरूरी है कि सिर्फ दो एंट्री में गड़बड़ी, और कुछ नहीं, अपने आप में जालसाजी या मनगढ़ंत कहानी का नतीजा नहीं निकाल सकती।" अदालत ने यह स्पष्ट किया कि जालसाजी से जुड़े क्रिमिनल लॉ के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि बेईमानी या धोखाधड़ी के इरादे से झूठे दस्तावेज बनाए गए थे। जब कोई शिकायत की जाती है, तो यह देखना जरूरी है कि उसमें प्रमाणित और विश्वसनीय जानकारी हो।
कोर्ट ने आगे कहा कि "ऐसी वेबसाइट की सामग्री ज्यादा से ज्यादा एक सवाल उठा सकती है जिसके लिए संबंधित एसोसिएशन से वेरिफिकेशन की जरूरत हो, और इसे उम्र या किसी भी तरह की जालसाजी का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता।" इसके अलावा, अदालत ने उल्लेख किया कि किसी निजी शिकायत को निपटाने के लिए सत्यापित धारणाओं और अंदाजों के आधार पर कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।
कोर्ट ने यह भी माना कि पहली नजर में ऐसा कोई सबूत रिकॉर्ड में नहीं लाया गया जिससे पता चले कि मन्हास ने कोई नकली दस्तावेज बनाया था या जानबूझकर कोई गलत बयान दिया था। इसलिए, अदालत ने इस मामले में दायर की गई अर्जी को खारिज कर दिया। स्पेशल रेलवे मजिस्ट्रेट संदीप सिंह सेन ने इसे कमजोर मानते हुए निर्णय सुनाया।
इस मामले के चलते मन्हास की छवि पर भी असर पड़ा, लेकिन कोर्ट के निर्णय ने उनके लिए थोड़ी राहत की सांस दी। क्रिकेट जगत में इस तरह के विवाद अक्सर उठते रहते हैं, लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि हर मामले की जांच सही तरीके से और निष्पक्षता से की जाए। कोर्ट का ये फैसला यह दिखाता है कि सिर्फ आरोप लगाने से किसी की छवि को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता, जब तक कि साबित न हो कि आरोप सही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, मन्हास के खिलाफ उठाए गए आरोपों में कोई आधार नजर नहीं आया। इस अनुभव से पता चलता है कि हर व्यक्ति को न्याय और उचित प्रक्रिया का अधिकार है। इस अदालती निर्णय ने यह साबित किया कि किसी भी व्यक्ति को सिर्फ आरोपों के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता।