लालकृष्ण आडवाणी: भारतीय राजनीति के युग पुरुष और भाजपा के संस्थापक अध्यक्ष की कहानी
लालकृष्ण आडवाणी: भारतीय राजनीति के युग पुरुष और भाजपा के संस्थापक अध्यक्ष की कहानी
NewsPoint•
लालकृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण नाम हैं। उन्हें एक युग का प्रतीक माना जाता है। वे 8 नवंबर 1927 को पाकिस्तान के सिंध प्रांत में जन्मे थे। आडवाणी ने भारतीय राजनीति में अपने विचारों और कार्यों से एक नई दिशा दी। उन्होंनें जनसंघ के दिनों से लेकर भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे हमेशा पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए 'भीष्म पितामह' रहे हैं। उनका राजनीतिक सफर आजादी के समय से शुरू हुआ, जब उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से देश सेवा के रास्ते को चुना।
देश की आजादी के कुछ घंटों बाद ही उन्हें भारत आना पड़ा। उनका सपना था कि वे हिंदुस्तान के लिए काम करें। उन्होंने जनसंघ के माध्यम से सक्रिय राजनीति में कदम रखा। आडवाणी की राम रथ यात्रा 1990 में हुई, जिसने उन्हें एक जननेता के तौर पर स्थापित किया। उन्होंने भाजपा को एक राष्ट्रीय पार्टी बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1984 में जब पार्टी को केवल 2 सीटें मिलीं, तो 1989 में उनकी मेहनत से भाजपा ने 86 सीटें पाई, जो उस समय पर एक बड़ी सफलता थी। आडवाणी ने हमेशा कांग्रेस की सत्ता से बाहर रहने की स्थिति को भी देखा। 1992 में भाजपा ने 121 सीटें जीतीं और 1996 में यह आंकड़ा बढ़कर 161 सीटों तक पहुंचा। आडवाणी का मानना था, "प्रकृति हमारे सामने खुशहाली और उनके मायने सामने लाकर रख देती है ताकि हम खुद उनमें से चुन सकें लेकिन मुझे भारी मात्रा में दोनों प्राप्त हुए हैं।"
लालकृष्ण आडवाणी को एक बुद्धिमान और सक्षम नेता माना जाता है। उनके विचार हमेशा भारत के विकास के लिए रहे। उन्होंने भारतीय राजनीति में राष्ट्रवाद को मजबूत किया। वे जानते थे कि राजनीति में लचीलापन कितना महत्वपूर्ण होता है। आडवाणी ने संगठन के काम को केवल सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्होंने उच्च स्तर पर जाकर देश की सेवा की। आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा के मामलों में उनकी नीतियां कड़ी और प्रभावी रही हैं।
संसद में उनके भाषण अक्सर तथ्य परक और राष्ट्रहित की दिशा में होते थे। उन्होंने लोकतंत्र, संविधान और संसद की परंपराओं के प्रति हमेशा सम्मान जताया। वे तीन दशक तक सांसद रहे और पहले गृह मंत्री बने। बाद में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मिलकर उप प्रधानमंत्री का पद संभाला।
2009 में जब चुनाव हुए, तो आडवाणी को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया। उस दौर में माना गया कि वे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। भाजपा के संसदीय बोर्ड ने 10 दिसंबर 2007 को यह भी औपचारिक ऐलान किया कि आडवाणी 2009 के चुनावों के लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे, लेकिन कांग्रेस और उसके गठबंधन की जीत के बाद आडवाणी ने सुषमा स्वराज को नेता प्रतिपक्ष बना दिया।
आडवाणी वे नेता हैं जिन्होंने 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद सबसे लंबे समय तक पार्टी की अध्यक्षता की। उनकी छठ दशकों की राजनीतिक यात्रा भारतीय राजनीति को समझने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने सिद्धांत, संगठनात्मक क्षमता और वैचारिक स्पष्टता को सामने रखा। इस समर्पण के चलते ही वे युग पुरुष बन सके।
उनके योगदान को देश ने भी पहचाना। 2015 में उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया। इसके बाद 2024 में उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' मिलने की उम्मीद है। आडवाणी ने न केवल भाजपा को पहचान दिलाई, बल्कि देश की राजनीति में भी महत्वपूर्ण स्थान बनाया। उनके इस सफर से यह स्पष्ट होता है कि किस तरह से एक व्यक्ति अपने विचारों और संघर्षों के बल पर बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकता है।
आडवाणी का जीवन और कार्य हमें यह सिखाते हैं कि मेहनत और दृढ़ता से हर देशभक्ति का सपना पूरा किया जा सकता है। उनके जैसे नेता इस देश को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। उनकी यात्रा हमें प्रेरित करती है कि हम कभी पीछे न हटें। यही है लालकृष्ण आडवाणी का राजनीतिक सफर, जो हमेशा स्मरणीय रहेगा।