लालकृष्ण आडवाणी: भारतीय राजनीति के युग पुरुष का सफर और योगदान
लालकृष्ण आडवाणी: भारतीय राजनीति के युग पुरुष का सफर और योगदान
NewsPoint•
लालकृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण नाम हैं। उनका जन्म 8 नवंबर 1927 को पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हुआ। आडवाणी ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत जनसंघ से की और बाद में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने ना सिर्फ पार्टी को एक विचारधारा दी, बल्कि उसे जनसमर्थन भी प्राप्त कराया। आडवाणी की पहचान 'लौह पुरुष' और भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए 'भीष्म पितामह' के रूप में बनी रही। उनकी जीवन कहानी में भारत की आजादी, जनसंघ की स्थापना और भाजपा का विस्तार शामिल है।
आडवाणी का राजनीतिक सफर देश के विभाजन के बाद शुरू हुआ। जब वे मात्र 14 साल के थे, तब उन्होंने अपना जीवन भारत की सेवा में लगाने का निर्णय लिया। इसके बाद, उन्होंने जनसंघ के माध्यम से सक्रिय राजनीति में कदम रखा। 1990 में उनकी राम रथयात्रा ने उन्हें जन नेता के रूप में स्थापित किया। यह यात्रा हिंदुत्व के संकेत को स्पष्ट करने वाली थी और इसने आडवाणी की लोकप्रियता को और बढ़ाया।आडवाणी भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी के करीबी रहे हैं। वाजपेयी ने 1972 में आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष बनने के लिए मनाया जब वे स्वयं अध्यक्ष पद से हटना चाहते थे। आडवाणी ने हालांकि पहले मना किया क्योंकि उन्हें अपने भाषण देने की क्षमता पर संदेह था। लेकिन वाजपेयी के विश्वास पर आडवाणी दिसंबर 1972 में अध्यक्ष बने।
आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा ने 1980 से 1990 तक का समय महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की। 1984 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को केवल 2 सीटें मिली थीं, लेकिन 1989 में यह संख्या बढ़कर 86 हो गई। इस सफलता ने भाजपा को राजनीतिक मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान दिलाया। आडवाणी ने उस समय कहा, "प्रकृति हमारे सामने खुशहाली और उनके मायने सामने लाकर रख देती है ताकि हम खुद उनमें से चुन सकें लेकिन मुझे भारी मात्रा में दोनों प्राप्त हुए हैं।"
आडवाणी का दृष्टिकोण हमेशा स्पष्ट और विचारशील रहा। उन्हें एक बुद्धिमान और सक्षम नेता माना जाता है। उनके प्रारंभिक दिनों से लेकर अंत तक, उन्होंने राष्ट्रवाद को अपना मूलाधार बनाए रखा। इससे पता चलता है कि आडवाणी ने राजनीतिक कार्य में लचीलापन और दायित्व का अहसास किया। उन्होंने आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सख्त नीतियाँ अपनाई। उनकी संसद में दिए गए भाषण हमेशा तथ्यात्मक और तार्किक रहे, जो राष्ट्रहित के प्रति उनके समर्पण को दर्शाते थे।
उन्होंने 30 साल से अधिक समय तक सांसद के रूप में कार्य किया। वे 1999 से 2004 के बीच अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में उप प्रधानमंत्री बने। 2009 के आम चुनावों में आडवाणी भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए गए। उनके समर्पण और सदाबहार नेता होने के नाते, पार्टी में उनकी स्थिति सबसे ऊँची रही। उनके अलावा सिर्फ वाजपेयी ही इस स्तर पर रहे।
हालांकि, 2009 के चुनावों में कांग्रेस और उसके गठबंधन ने जीत हासिल की और मनमोहन सिंह पुनः प्रधानमंत्री बने। इसके बाद आडवाणी ने सुषमा स्वराज को 15वीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में नियुक्त किया। भाजपाकी अध्यक्षता का उनका समय सबसे लंबा रहा है। उन्होंने अपने कार्यकाल में पार्टी की नींव को मजबूत किया।
आडवाणी की राजनीतिक यात्रा 60 साल से ज्यादा रही है। यह सफर भारतीय राजनीति को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। उनका समर्पण, संगठनात्मक कौशल और विचारधारा ने उन्हें युग पुरुष बना दिया है। उन्होंने सिद्धांतों पर चलते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति अपनी निष्ठा दिखाई।
2015 में आडवाणी को उनके योगदान के लिए पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 2024 के आम चुनावों के मद्देनजर, उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया। आडवाणी का जीवन एक उदाहरण है कि कैसे एक नेता अपनी धारणाओं और सिद्धांतों के साथ आगे बढ़ सकता है।
उनकी भूमिका भारतीय राजनीति में अत्यधिक महत्वपूर्ण रही है। उनके द्वारा दिखाए गए नेतृत्व और दूरदर्शिता से नई पीढ़ियों को भी प्रेरणा मिलती रहेगी। आडवाणी का नाम राजनीति में हमेशा एक आदर्श के रूप में लिया जाएगा। उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता और यह निश्चित रूप से आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक रहेगा।