लालकृष्ण आडवाणी: भारतीय राजनीति का युग पुरुष और भाजपा के संस्थापक चेहरे
लालकृष्ण आडवाणी: भारतीय राजनीति का युग पुरुष और भाजपा के संस्थापक चेहरे
NewsPoint•
लालकृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति के एक प्रमुख स्तंभ रहे हैं। उनका जन्म 8 नवंबर 1927 को पाकिस्तान के सिंध प्रांत में हुआ था। उन्होंने जनसंघ के दिनों से लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आडवाणी को 'भीष्म पितामह' कहा जाता है और उन्होंने पार्टी को न केवल विचारधारा दी बल्कि उसे जनाधार भी प्रदान किया। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत भारत के विभाजन के बाद की, जब उन्होंने देश सेवा का संकल्प लिया। 14 वर्ष की आयु में आडवाणी ने हिंदुस्तान को अपना जीवन समर्पित किया था। उनका यात्रा 1980 में भाजपा के गठन के साथ एक नई ऊंचाई पर पहुंचा, जहां उन्होंने एक मजबूत नेता के रूप में पार्टी को स्थापित किया।
आडवाणी का व्यक्तित्व भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वे एक बुद्धिमान, सक्षम और मजबूत नेता माने जाते रहे हैं। उनके नेतृत्व में भाजपा ने 1984 के चुनावों में महज 2 सीटें जीती थीं, वहीं 1989 में उनकी मेहनत से पार्टी ने 86 सीटें हासिल कीं। यह उस समय के लिए बेहद महत्वपूर्ण था। इसके बाद, 1992 में उनकी कड़ी मेहनत के परिणामस्वरूप भाजपा की सीटों की संख्या 121 हो गई। 1996 में यह संख्या और बढ़कर 161 हो गई। आडवाणी ने इस दौर में कहा था, "प्रकृति हमारे सामने खुशहाली और उनके मायने सामने लाकर रख देती है ताकि हम खुद उनमें से चुन सकें लेकिन मुझे भारी मात्रा में दोनों प्राप्त हुए हैं।"आडवाणी ने कभी भी राष्ट्रवाद के मूल सिद्धांत को नहीं छोड़ा। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में लचीलापन भी दिखाया। वे एक संगठनकर्ता के रूप में प्रसिद्ध रहे हैं और इसके साथ ही उन्होंने देश की सुरक्षा के मुद्दों पर सख्त रुख अपनाया। उन्होंने संसद में अनेक महत्वपूर्ण भाषण दिए, जो तथ्यात्मक और तार्किक रहे। आडवाणी का उपभोक्तावादी अर्थव्यवस्था और संविधान के प्रति सम्मान सभी दलों के लिए अनुकरणीय है।
सांसद के रूप में उनकी तीन दशक लंबी पारी में उन्होंने गृह मंत्रालय का कार्यभार संभाला और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में 1999 से 2004 तक उप प्रधानमंत्री बने। जब 2009 के चुनावों में उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाया गया, तब सभी ने सोचा कि वे भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। आडवाणी ने हमेशा कहा कि उनके पक्ष में उनकी राजनीतिक अनुभव और नेतृत्व की शक्ति थी।
भाजपा के संसदीय बोर्ड ने 10 दिसंबर 2007 को आधिकारिक रूप से यह ऐलान किया कि 2009 के आम चुनावों के लिए लालकृष्ण आडवाणी ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। लेकिन जब कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने चुनाव जीत लिया और मनमोहन सिंह फिर से प्रधानमंत्री बने, आडवाणी ने सुषमा स्वराज को नेता प्रतिपक्ष बनाया।
आडवाणी भाजपा के सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष बने। उनकी राजनीतिक यात्रा ने भारतीय राजनीति के विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे सिद्धांत, संगठनात्मक क्षमता और वैचारिक स्पष्टता के प्रतीक बने। 2015 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया और 2024 में भारत रत्न से नवाजा गया।
आडवाणी की यात्रा केवल उनके राजनीतिक करियर तक सीमित नहीं रही। उन्होंने पार्टी के विचारों और सिद्धांतों को प्रचारित किया। उनकी उपस्थिति ने भाजपा को एक मजबूत पार्टी में बदलने में मदद की है। आडवाणी हमेशा से नेतृत्व में विश्वास रखते थे और अपने अनुभव का उपयोग कर पार्टी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी सोच और विचार आज भी भाजपा के लिए मार्गदर्शन करते हैं।
आडवाणी के विचार और उनके कार्यों का असर न केवल भाजपा पर बल्कि समूची भारतीय राजनीति पर पड़ा है। वे हमेशा लोकतंत्र और संविधान के प्रति अपने सम्मान को बनाए रखते हैं। उनकी नीतियों ने देश की सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
उनके नेतृत्व में भाजपा ने एक नई राजनीति की धारा में प्रवेश किया। उनकी आवाज में वे अद्भुत वाकपटुता थी, जिससे उन्होंने राष्ट्र को जीतने का दृढ़ संकल्प किया। आडवाणी का विश्वास और जुनून उन्हें एक विशेष स्थान पर लाते हैं। वे एक ऐसे नेता हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे कभी हार नहीं मानते। उनकी सोच में एक सकारात्मक दृष्टिकोण है जो हमेशा देश की भलाई के लिए काम करता है।
अंत में, लालकृष्ण आडवाणी का जीवन और करियर एक प्रेरणा है। उनका आदर्श और सिद्धांत हमें सिखाते हैं कि कैसे एक दृढ़ नेता अपनी पार्टी और अपने देश को आगे बढ़ा सकता है। चाहे वे चुनाव जीतें या हारें, उनका संकल्प और कार्य हमेशा उनके साथ रहेंगे। भारतीय राजनीति में उनका योगदान अमिट रहेगा। यही कारण है कि वे भारतीय राजनीति की एक अनमोल धरोहर हैं।