क्या असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश में एआईएमआईएम के जरिए भाजपा विरोधी गठबंधन को कमजोर कर सकते हैं?
क्या असदुद्दीन ओवैसी उत्तर प्रदेश में एआईएमआईएम के जरिए भाजपा विरोधी गठबंधन को कमजोर कर सकते हैं?
NewsPoint•
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को बड़ा झटका लगा है। विपक्षी गठबंधन में शामिल होने की कोशिशों के बावजूद, सपा इसकी ओर से दूरी बनाए हुए हैं। ओवैसी की पार्टी, जो बिहार में विपक्ष के वोटों को बांटने का आरोप झेल चुकी है, उत्तर प्रदेश में भी अपनी चुनावी उपस्थिति से सवाल खड़े कर सकती है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव एआईएमआईएम को गठबंधन में शामिल करने के लिए तैयार नहीं हैं। इसके पीछे वजह संभवतः यह है कि सपा नहीं चाहती कि एआईएमआईएम उनके मुस्लिम मतदाता आधार को प्रभावित करे।
बिहार में एआईएमआईएम ने विधान सभा चुनाव में महागठबंधन के साथ सीट बंटवारे की बातचीत की थी लेकिन सकारात्मक जवाब न मिलने पर वे अकेले चुनाव लड़े और मुस्लिम बहुल इलाकों से सफलता पाई। ओवैसी ने भाजपा विरोधी दलों के साथ काम करने की इच्छा जताई है। लेकिन सपा और कांग्रेस ने उनसे दूरी बना रखी है। एआईएमआईएम ने पहले भी 2017 और 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अकेले चुनाव लड़ा था।बिहार के चुनावी समीकरण उत्तर प्रदेश से अलग हैं। बिहार में एआईएमआईएम ने मुस्लिम मतदाताओं का सटीक आधार पाया, जिससे पार्टी ने वहां सफलता हासिल की। सीमांचल क्षेत्र में पार्टी ने खुद को एक मजबूत विकल्प के तौर पर पेश किया, विशेष रूप से उन मतदाताओं के लिए जो महागठबंधन से संतुष्ट नहीं थे। आलोचक ओवैसी पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि वो विपक्षी वोटों को बांट रहे हैं, जबकि एआईएमआईएम ने अपनी दलील दी है कि वे केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व के खालीपन को भरने का प्रयास कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में स्थिति अलग है। वहां मुस्लिम मतदाता अलग-अलग क्षेत्रों में फैले हुए हैं। उदाहरण के लिए, रोहिलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध के कुछ हिस्से और पूर्वी जिले। यहां 2022 का विधानसभा चुनाव और 2024 का लोकसभा चुनाव भाजपा के खिलाफ सपा को मुख्य विकल्प के रूप में पेश कर चुका है। कई मुस्लिम मतदाता चुनावी जीत की संभावना को प्राथमिकता देते हैं और ये सपा के लिए रणनीतिक मतदान की प्रवृत्ति को और मजबूत करता है।
ओवैसी के लिए यह चुनौती है कि वे अपने वोटर्स को यह आश्वस्त करें कि एआईएमआईएम को वोट देने से उन्हें प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिलेगा, न कि विपक्ष की चुनावी संभावनाएं कमजोर होंगी। हालांकि, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल सकता है। खासकर जिन जिलों में मुस्लिम आबादी का अच्छा खासा प्रतिशत है और जहां एआईएमआईएम मजबूत उम्मीदवार उतारेगी।
अब चर्चाएं एआईएमआईएम और मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संभावित गठबंधन पर भी हो रही हैं। इसे 'दलित-मुस्लिम' या 'भीम-मीम' फॉर्मूले के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन मायावती इस प्रकार के गठबंधन के प्रति अनिच्छुक नजर आ रही हैं। बसपा स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की पक्षधर है। लोकतंत्र में दलित वोटों को कितनी प्राथमिकता दी जाएगी, इसे लेकर भी सवाल उठते हैं।
संक्षेप में कहें तो, एआईएमआईएम को यह साबित करना होगा कि वे उत्तर प्रदेश में भी एक राजनीतिक ताकत बन सकते हैं। बिहार के चुनावी अनुभव बताता है कि किसी सीमित क्षेत्र में भी मजबूत वोट आधार चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। अब यह देखना होगा कि एआईएमआईएम ऐसे आधार उत्तर प्रदेश में कैसे तैयार करती है, क्योंकि यही उनका सबसे बड़ा चैलेंज होगा।
यदि एआईएमआईएम उत्तर प्रदेश में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने में सफल होती है तो ये निश्चित रूप से राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करेगा। लेकिन, क्या ओवैसी की पार्टी ये कर पाएगी? यह सवाल 2027 के विधानसभा चुनावों का प्रमुख केंद्र बन जाएगा।