कनाडा में खालिस्तान जनमत संग्रह केवल राजनीतिक दिखावा, रिपोर्ट में साबित हुआ
कनाडा में खालिस्तान जनमत संग्रह केवल राजनीतिक दिखावा, रिपोर्ट में साबित हुआ
NewsPoint•
ओटावा, 7 नवंबर (आईएएनएस)। कनाडा में 'सिख्स फॉर जस्टिस' (एसएफजे) नामक आतंकी संगठन द्वारा आयोजित 'खालिस्तान जनमत संग्रह' (रेफरेंडम) को हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में केवल एक राजनीतिक स्टंट बताया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में इन जनमत संग्रहों की कोई कानूनी मान्यता नहीं है। इसका न तो भारत के क्षेत्रीय अखंडता पर कोई असर पड़ता है और न ही यह कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बावजूद इसके, कनाडा के शहरों में इन जनमत संगठनों के चलते रैलियां, प्रदर्शन और टकराव जैसी घटनाएं बढ़ी हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि सरे और ब्रैम्पटन जैसे क्षेत्रों में नियमों का उल्लंघन करते हुए प्रदर्शन हुए हैं। इस दौरान कुछ हिंदू मंदिरों में तोड़फोड़ की घटनाएं भी सामने आई हैं। भारतीय राजनयिकों को धमकियां मिली हैं, जिससे सुरक्षा चिंताएं और भी बढ़ गई हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि पुलिस को कुछ कार्यकर्ताओं की जान की सुरक्षा को लेकर चेतावनी जारी करनी पड़ी। इस साल खालिस्तान समर्थक आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बाद भारत और कनाडा के बीच राजनयिक तनाव बढ़ गया था। इसके बाद कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के नेतृत्व में दोनों देशों के संबंधों में सुधार हो रहा है। व्यापार, ऊर्जा सहयोग और एक व्यापक आर्थिक साझेदारी की बातों ने इस सुधार में बड़ी भूमिका निभाई है। फिर भी, यह सुधार पूरी तरह से नहीं हुआ है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कनाडा के नागरिकों पर यह नहीं होना चाहिए कि वे विदेशी राजनीतिक एजंडों को सहन करें, जो भारत की आंतरिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को कनाडा की धरती पर लाते हैं। रिपोर्ट से यह भी सामने आया है कि कनाडा में रहने वाले अधिकांश सिख अलगाववाद का समर्थन नहीं करते। यह आंदोलन केवल एक छोटे लेकिन सक्रिय समूह तक सीमित है।
हालांकि, अगर इस छोटे समूह को कनाडा-भारत संबंधों पर असर डालने दिया गया, तो यह हानिकारक हो सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस प्रकार के अलगाववादी आंदोलनों का असर भारत जैसे महत्वपूर्ण साझेदार देशों के साथ संबंध पर पड़ता है। इनसे सुरक्षा से जुड़ी घटनाएं बढ़ती हैं और आम नागरिकों में असंतोष उत्पन्न होता है।
कई लोग यह देखकर असहज महसूस करते हैं कि उनके स्थानीय शहरों में विदेशी झंडे और अलगाववादी नारों की धूम रहती है। इसमें एक लेजर सर्वेक्षण का उल्लेख किया गया है, जो 2025 की शुरुआत में हुआ था। इस सर्वे में पता चला कि कनाडा में सिख समुदाय का केवल एक छोटा हिस्सा ही खालिस्तानी अलगाववादी गतिविधियों का समर्थन करता है।
सर्वे में यह भी कहा गया कि 54 प्रतिशत लोग इन गतिविधियों का विरोध करते हैं। वहीं, 72 प्रतिशत लोग कनाडा में विदेशी अलगाववादी एजेंडे को रोकने के लिए सख्ती से कदम उठाने के पक्ष में हैं। 37 प्रतिशत लोगों ने इस आंदोलन का कठोर विरोध किया है। रिपोर्ट में कहा गया है, "ये ऐसे आंकड़े नहीं हैं जो यह दर्शाते हों कि समाज अभी भी विदेशों से चलाए जा रहे अलगाववादी अभियान को 'प्रवासी समुदाय की अभिव्यक्ति की आजादी' के रूप में एक हानिरहित गतिविधि मानकर स्वीकार करने के लिए तैयार है।''
इससे स्पष्ट होता है कि कनाडा का बड़ा हिस्सा अब ऐसे अलगाववादी आंदोलनों से परेशान हो चुका है। लोग नहीं चाहते कि उनका समुदाय किसी दूसरे देश के अनसुलझे संघर्ष का मचान बने। साथ ही, उन्हें यह भी चिंता है कि कोई एक शोर मचाने वाला प्रवासी समूह उनकी देश की विदेश नीति पर जरूरत से ज्यादा प्रभाव ना डाले। इस प्रकार, कनाडा में जनमत संग्रह का राजनीतिक महत्व कम हो चुका है, जबकि आम नागरिक ऐसे आयोजनों से दूर रहना चाहते हैं।