ट्रंप, पुतिन और जिनपिंग की संभावित बैठक पर चीन की सहमति का इंतजार

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Navbharat Times
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन चाहते हैं कि वे चीन में मिलें। इस बैठक में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को भी शामिल किया जा सकता है। यह संभावित मुलाकात 18-19 नवंबर को चीन के शेनझेन शहर में होने वाले एशिया-पैसिफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन (APEC) समिट के दौरान हो सकती है। हालांकि, चीन ने अभी तक इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति नहीं दी है। उसने इसे खारिज भी नहीं किया है। इस बीच, तीनों देशों के बीच बातचीत चल रही है और बैठक को लेकर सस्पेंस बना हुआ है।

रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने 19 अक्टूबर को इस बैठक का प्रस्ताव रखा था। उसी दिन ट्रम्प ने भी इसमें शामिल होने के लिए अपनी रजामंदी दे दी। दोनों नेताओं ने जिनपिंग को भी बैठक में शामिल करने का सुझाव दिया है। अब सबकी नजर चीन के फैसले पर है।
चीन की बैठक को लेकर हिचकिचाहट की एक बड़ी वजह यूक्रेन युद्ध है। जिनपिंग को कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ, चीन नहीं चाहता कि उसकी रूस के साथ रणनीतिक और आर्थिक संबंध खराब हों। वहीं दूसरी ओर, वह यूरोपीय देशों के साथ व्यापारिक रिश्तों को भी नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता। यूक्रेन युद्ध के कारण रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव बना हुआ है। ऐसे में पुतिन के साथ किसी बड़ी बैठक में शामिल होना चीन के लिए संवेदनशील हो सकता है। यदि जिनपिंग इस बैठक में शामिल होते हैं, तो इसे रूस के प्रति चीन के समर्थन के संकेत के तौर पर देखा जा सकता है। वहीं, अगर वह बैठक से दूर रहते हैं, तो रूस के साथ संबंधों पर सवाल उठ सकते हैं।

तीनों नेताओं की बैठक चीन के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति को मजबूत करने का एक बड़ा अवसर बन सकती है। इस मुलाकात के जरिए चीन खुद को अमेरिका के बराबर एक बड़ी वैश्विक ताकत के रूप में पेश कर सकता है। बैठक में यूक्रेन युद्ध, अमेरिका-रूस संबंधों और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। हालाँकि, अभी बैठक का एजेंडा और प्रारूप आधिकारिक तौर पर स्पष्ट नहीं है।

चीन को 1945 के याल्टा समझौते की तरह स्थिति बनने की चिंता भी है। द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दौर में याल्टा सम्मेलन में अमेरिका, ब्रिटेन और सोवियत संघ के नेताओं ने युद्ध के बाद की वैश्विक व्यवस्था पर चर्चा की थी। चीन लंबे समय से याल्टा समझौते की आलोचना करता रहा है। उसे डर है कि अगर बड़ी शक्तियां आपस में बातचीत करती हैं, तो छोटे देशों के हितों को नजरअंदाज किया जा सकता है। इस मामले में जिनपिंग के लिए बैठक में शामिल होना आसान नहीं है।

फिलहाल, अमेरिका, रूस और चीन के बीच इस संभावित मुलाकात को लेकर बातचीत जारी है। चीन की अंतिम सहमति के बाद यह साफ हो पाएगा कि क्या नवंबर में शेनझेन में तीनों देशों के राष्ट्रपति एक मंच पर दिखाई देंगे या नहीं। सभी की नजर अब चीन के फैसले पर है।

इस बैठक से सभी को उम्मीद है कि वैश्विक मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। तीन बड़े नेता एक साथ आएंगे तो दुनिया को एक बड़ा संदेश एकजुटता का मिलेगा। इस प्रकार की मुलाकात में वैश्विक राजनीति का माहौल काफी हद तक बदल सकता है। यह बैठक दुनिया के आर्थिक और राजनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित करेगी।

आशा है कि आने वाले दिनों में चीन अपनी सहमति दे देगा। अगर ऐसा हुआ, तो यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक अहम मोड़ होगा। यह पहली बार होगा जब तीन बड़ी शक्तियाँ एक साथ आकर बातचीत करेंगी। सभी की आँखें इस ऐतिहासिक बैठक पर टिकी हैं।

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