टीम इंडिया नाम पर रोक की याचिका खारिज: सुप्रीम कोर्ट ने कहा 'बेकार'

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सुप्रीम कोर्ट ने टीम इंडिया नाम पर रोक की याचिका को पूरी तरह बेकार बताया। कोर्ट ने कहा कि यह याचिका समय की बर्बादी है। प्रधान न्यायाधीश की पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। याचिकाकर्ता का मानना था कि बीसीसीआई को टीम इंडिया कहना जनता को गुमराह करता है।

team india name ban plea rejected supreme court calls it useless waste of time
नई दिल्ली, 22 जनवरी (भाषा) सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी याचिका को पूरी तरह से बेकार बताते हुए खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया था कि प्रसार भारती को बीसीसीआई की क्रिकेट टीम को 'टीम इंडिया' कहने से रोका जाए। कोर्ट ने कहा कि यह याचिका समय की बर्बादी है और अदालत पर बेवजह का बोझ डाल रही है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को भी बरकरार रखा जिसने वकील रीपक कंसल की जनहित याचिका को खारिज कर दिया था।

याचिका में यह दलील दी गई थी कि बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया (बीसीसीआई) को 'टीम इंडिया' या ' भारतीय क्रिकेट टीम ' कहना जनता को गुमराह करता है। याचिकाकर्ता का मानना था कि यह राष्ट्रीय प्रतीकों के इस्तेमाल से जुड़े कानूनों का उल्लंघन है। याचिका में यह भी कहा गया था कि बीसीसीआई एक निजी संस्था है और उसे 'टीम इंडिया' नहीं कहा जाना चाहिए, खासकर तब जब उसे भारत सरकार से कोई मंजूरी न मिली हो।
इस पर पीठ ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, "यह सरासर अदालत और आपके समय की बर्बादी है... यह क्या तर्क है? क्या आप कह रहे हैं कि टीम भारत का प्रतिनिधित्व नहीं करती? जो टीम हर जगह जाकर खेल रही है, वे उसके बारे में गुमराह कर रहे हैं?" कोर्ट ने आगे कहा, "बीसीसीआई को भूल जाइए, अगर दूरदर्शन या कोई दूसरा प्राधिकार इसे टीम इंडिया के तौर पर दिखाए, तो क्या यह टीम इंडिया नहीं है?"

पीठ ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए कहा, "आप बस घर बैठकर याचिका का मसौदा बनाना शुरू कर दें। इस सब में क्या दिक्कत है? अदालत पर बोझ न डालें।" कोर्ट ने साफ कर दिया कि 'टीम इंडिया' कहना किसी भी तरह से जनता को गुमराह नहीं करता और यह टीम देश का प्रतिनिधित्व करती है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि चाहे कोई भी संस्था टीम को 'टीम इंडिया' कहे, वह तब भी भारत का प्रतिनिधित्व ही करती है। यह याचिका पूरी तरह से बेतुकी थी और कोर्ट ने इसे खारिज करके याचिकाकर्ता को भविष्य में ऐसे मामलों में अदालत का समय बर्बाद न करने की हिदायत दी।