कर्नाटका के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने CJI पर जूता फेंकने के प्रयास की निंदा की

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सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई जस्टिस बी.आर. गवाई पर जूता फेंकने के प्रयास की कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कड़ी निंदा की है। उन्होंने इस घटना को समाज में जातिगत पूर्वाग्रहों के बने रहने की याद दिलाने वाला बताया। मुख्यमंत्री ने कहा कि दोषी वकील के साथ-साथ ऐसे व्यवहार का समर्थन करने वालों पर भी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

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कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में हुई उस घटना की कड़ी निंदा की है, जिसमें एक वकील ने कथित तौर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश ( CJI ) जस्टिस बी.आर. गवाई पर जूता फेंकने की कोशिश की थी। उन्होंने इस घटना को समाज में जातिगत पूर्वाग्रह ों के बने रहने की याद दिलाने वाला बताया। सिद्धारमैया ने कहा कि किसी भी धर्म में नफरत सिखाना नहीं सिखाया जाता और कानून की पढ़ाई करने वाले एक वकील का ऐसा आचरण निंदनीय है, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐसी घटनाएं समाज में शांति स्थापित होने में बाधा डालती हैं। इससे पहले भी मुख्यमंत्री ने इस कृत्य की आलोचना करते हुए कहा था कि यह दर्शाता है कि "जातिगत पूर्वाग्रह और मनुवादी मानसिकता अभी भी बनी हुई है।"

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा कि न केवल दोषी वकील पर, बल्कि ऐसे व्यवहार का समर्थन करने या उसे बढ़ावा देने वालों पर भी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने लिखा, "मैं उस घटना की कड़ी निंदा करता हूं जिसमें एक वकील ने माननीय मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट, जस्टिस बी.आर. गवाई पर जूता फेंकने की कोशिश की। उस unruly वकील के खिलाफ तत्काल कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए जिसने मुख्य न्यायाधीश और न्यायपालिका दोनों का अपमान करने की कोशिश की।" जस्टिस गवाई के दलित समुदाय से होने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जस्टिस गवाई ने अपनी योग्यता और दृढ़ता से सामाजिक बाधाओं को पार करते हुए न्यायपालिका के सर्वोच्च पद तक पहुंचे हैं। यह घटना एक कड़वी सच्चाई है कि भारतीय संविधान लागू होने के 75 साल बाद भी जातिगत पूर्वाग्रह और मनुवादी सोच बनी हुई है।
सिद्धारमैया ने सीजेआई के प्रति एकजुटता व्यक्त करते हुए कहा, "जस्टिस गवाई अकेले नहीं हैं। करोड़ों धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक नागरिक जो संविधान के मूल्यों को बनाए रखते हैं, वे उनके साथ मजबूती से खड़े हैं। मुख्य न्यायाधीश किसी धर्म या राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व नहीं करते।" उन्होंने आगे कहा, "इस दृष्टिकोण से, मैं सभी जातियों, धर्मों और राजनीतिक संबद्धताओं के लोगों से अपील करता हूं कि वे इस शर्मनाक कृत्य की सर्वसम्मति से निंदा करें।" मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जाति और धर्म पर आधारित विभाजनकारी राजनीति ने राकेश किशोर जैसे वकीलों की मनुवादी सोच को पनपने का मौका दिया है। जिस तरह कुछ लोग नाथूराम गोडसे को एक राष्ट्रवादी नायक के रूप में महिमामंडित करने की कोशिश करते हैं, उसी तरह अब कुछ तत्व वकील के इस शर्मनाक कृत्य का जश्न मना रहे हैं।

इस बीच, मैसूरु के लक्ष्मिपुरम पुलिस ने दिल्ली के वकील राकेश किशोर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 132 और 133 के तहत मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ अपराध करने के आरोप में FIR दर्ज की है। यह FIR 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में हुई घटना के संबंध में दर्ज की गई है। मैसूरु के वकील पुनीत ने शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने बताया कि पुलिस ने पहले एक नॉन-कॉग्निजेबल रिपोर्ट (NCR) दर्ज करने का संकेत दिया था, लेकिन बाद में FIR दर्ज की, जो इस जिले में इस घटना के संबंध में पहली FIR है। शिकायतकर्ता के अनुसार, किशोर द्वारा किया गया कृत्य दंडनीय अपराध है।

यह घटना इसी महीने सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही के दौरान हुई थी। खबरों के मुताबिक, किशोर ने कथित तौर पर सीजेआई गवाई पर जूता फेंकने की कोशिश की थी और मध्य प्रदेश के खजुराहो में एक भगवान विष्णु की मूर्ति के पुनर्निर्माण से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश द्वारा की गई एक टिप्पणी के विरोध में नारे लगाए थे। किशोर ने बाद में अपने कार्यों का बचाव करते हुए कहा, "कोई पछतावा नहीं, भगवान ने मुझे उकसाया।" मौके पर मौजूद वकीलों के अनुसार, व्यक्ति चिल्ला रहा था, "सनातन धर्म का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान" जब उसे कोर्ट रूम से बाहर निकाला जा रहा था। कुछ गवाहों ने कहा कि उसने जूता फेंकने की कोशिश की, जबकि अन्य का दावा है कि उसने कागज का एक रोल फेंका था। इस व्यवधान पर प्रतिक्रिया देते हुए सीजेआई गवाई ने कहा था: "इन सब बातों से विचलित न हों। हम विचलित नहीं हैं। ये चीजें मुझे प्रभावित नहीं करतीं।"

यह घटना न्यायपालिका की गरिमा पर एक गंभीर हमला है। मुख्य न्यायाधीश जैसे सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति पर इस तरह का हमला न केवल व्यक्तिगत रूप से अपमानजनक है, बल्कि पूरे न्याय तंत्र पर भी सवाल उठाता है। यह दर्शाता है कि समाज में अभी भी ऐसे तत्व मौजूद हैं जो कानून और व्यवस्था का सम्मान नहीं करते और अपनी बात मनवाने के लिए हिंसक या अपमानजनक तरीकों का सहारा लेते हैं। वकील का यह कृत्य, जो कानून का रक्षक होता है, अत्यंत निंदनीय है। यह इस बात का भी संकेत है कि कुछ लोग धार्मिक या वैचारिक मतभेदों को इस हद तक ले जा रहे हैं कि वे सार्वजनिक मंचों पर भी मर्यादाओं को लांघने से नहीं हिचकिचाते।

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस घटना को जातिगत पूर्वाग्रह से जोड़कर एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। जस्टिस गवाई का दलित समुदाय से होना और सर्वोच्च पद तक पहुंचना कई लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। ऐसे में उन पर हमला करना, विशेषकर जातिगत पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर, समाज में गहरी खाई पैदा करने का प्रयास है। यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि भले ही हमने कानूनी रूप से जाति व्यवस्था को समाप्त कर दिया हो, लेकिन सामाजिक मानसिकता में बदलाव लाना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। मनुवादी मानसिकता का उल्लेख करके मुख्यमंत्री ने उन विचारधाराओं पर भी निशाना साधा है जो सामाजिक असमानता और पूर्वाग्रहों को बढ़ावा देती हैं।

इस तरह की घटनाएं समाज में असहिष्णुता और नफरत को बढ़ावा देती हैं। जब कानून के रक्षक ही कानून तोड़ने लगें या अपमानजनक व्यवहार करें, तो आम जनता के लिए एक अच्छा उदाहरण पेश नहीं होता। यह महत्वपूर्ण है कि ऐसे कृत्यों को किसी भी सूरत में बर्दाश्त न किया जाए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले ताकि भविष्य में कोई भी ऐसा दुस्साहस करने से पहले सोचे। यह केवल एक वकील का कृत्य नहीं है, बल्कि यह उन ताकतों का भी प्रतिनिधित्व करता है जो समाज को बांटना चाहती हैं और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाना चाहती हैं। इसलिए, सभी नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वे ऐसी घटनाओं की निंदा करें और न्यायपालिका के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करें।