ईरान संकट भारत के लिए चुनौती

नवभारत टाइम्स

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या से देश में सत्ता का संकट खड़ा हो गया है। भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि इससे ऊर्जा सुरक्षा और चाबहार पोर्ट जैसे रणनीतिक निवेश प्रभावित हो सकते हैं। क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका है।

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शनिवार, 28 फरवरी को अमेरिका और इस्राइल के संयुक्त हमले में ईरान के 86 वर्षीय सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई तेहरान स्थित अपने दफ्तर में मारे गए। ईरान के सरकारी मीडिया ने इस खबर की पुष्टि की है। इस घटना के जवाब में ईरान ने इराक, खाड़ी देशों और इस्राइल में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं। खामेनेई की मौत से ईरान की सत्ता खाली हो गई है और संविधान के अनुसार, जब तक एक्सपर्ट्स असेंबली नया उत्तराधिकारी नहीं चुन लेती, तब तक राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, जुडिशरी प्रमुख गुलाम होसैन मोहसेनी इजेही और गार्डियन काउंसिल के एक ज्यूरिस्ट की तीन सदस्यीय अस्थायी काउंसिल सर्वोच्च सत्ता संभालेगी। यह भी कहा जा रहा है कि खामेनेई ने पिछले साल ही युद्ध के दौरान कई संभावित वारिसों के नाम तय कर लिए थे, जिनमें अयातुल्ला अलीरेज अराफी, अयातुल्ला मोहसेन अराकी, अयातुल्ला हशेम हुसैनी बुशहरी और संभवतः जुडिशरी प्रमुख मोहसेनी इजेही शामिल हैं। इसके अलावा, खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई और हसन खुमैनी के नाम भी चर्चा में हैं। इस घटनाक्रम से ईरान में राजनीतिक उथल-पुथल मचने की आशंका है, अर्थव्यवस्था पर असर पड़ सकता है, और भारत जैसे देशों के लिए भी गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के बाद देश में सत्ता का खाली होना एक बड़ी घटना है। ईरान का संविधान इस स्थिति से निपटने के लिए एक व्यवस्था बताता है। एक्सपर्ट्स असेंबली, जो कि एक खास परिषद है, जब तक नया सुप्रीम लीडर नहीं चुन लेती, तब तक तीन लोगों की एक अस्थायी काउंसिल देश की बागडोर संभालेगी। इस काउंसिल में देश के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, न्यायपालिका के प्रमुख गुलाम होसैन मोहसेनी इजेही और गार्डियन काउंसिल के एक वरिष्ठ वकील शामिल होंगे। यह काउंसिल तब तक देश की सर्वोच्च सत्ता का संचालन करेगी जब तक कि एक्सपर्ट्स असेंबली एक स्थायी उत्तराधिकारी का चुनाव नहीं कर लेती।
यह भी खबर है कि खामेनेई ने अपनी मृत्यु से पहले ही अपने संभावित उत्तराधिकारियों के नामों पर विचार कर लिया था। पिछले साल, युद्ध के माहौल में, उन्होंने कई ऐसे लोगों के नाम तय कर लिए थे जो उनके बाद नेतृत्व संभाल सकते थे। इन नामों में ईरानी मदरसों के प्रमुख अयातुल्ला अलीरेज अराफी, अयातुल्ला मोहसेन अराकी, अयातुल्ला हशेम हुसैनी बुशहरी और न्यायपालिका प्रमुख मोहसेनी इजेही जैसे प्रभावशाली मौलवी शामिल हैं। इसके अलावा, खामेनेई के अपने बेटे मोजतबा खामेनेई और हसन खुमैनी के नाम भी इस सूची में बताए जा रहे हैं। यह दर्शाता है कि खामेनेई ने अपने बाद की व्यवस्था के लिए पहले से ही योजना बना रखी थी।

ईरान में सत्ता के हस्तांतरण को लेकर तीन मुख्य संभावनाएं जताई जा रही हैं। पहली संभावना यह है कि मौजूदा व्यवस्था बनी रहेगी। इसका मतलब है कि देश की मौलवी विचारधारा बरकरार रहेगी और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को सत्ता में मजबूत समर्थन मिलता रहेगा। IRGC ईरान की सेना का एक शक्तिशाली अंग है और देश की सुरक्षा तथा राजनीतिक व्यवस्था में इसकी अहम भूमिका है।

दूसरी संभावना यह है कि IRGC सीधे तौर पर सत्ता पर काबिज हो जाए। ऐसे में, IRGC सैन्य नियंत्रण स्थापित कर सकता है, सुरक्षा प्रणालियों पर अपना दबदबा बढ़ा सकता है और मौलवी संस्थाओं को हाशिए पर धकेल सकता है। यह ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव ला सकता है।

तीसरी और सबसे खतरनाक संभावना यह है कि सत्ता के अमीरों के बीच आपसी संघर्ष छिड़ जाए। इससे बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं या दलबदल के कारण सरकार गिर सकती है। हालांकि, यह उम्मीद कम है कि इस स्थिति में ईरान में लोकतंत्र आएगा।

ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही काफी कमजोर है। देश कई गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है, जैसे कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, बढ़ती महंगाई और मुद्रा का लगातार गिरना। अगर नया नेतृत्व भी कट्टरपंथी रवैया अपनाता है, तो अमेरिका के साथ टकराव और बढ़ने का खतरा है। केवल एक ऐसा नेता ही जो व्यावहारिक हो और बातचीत के लिए तैयार हो, प्रतिबंधों में कुछ राहत दिला सकता है। लेकिन, अगर जनता को यह लगा कि नया नेता दबाव में आकर समझौता कर रहा है, तो उसे घरेलू मोर्चे पर मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

ईरान ने अमेरिका और इस्राइल के हमले का जवाब देते हुए इराक, यमन और लेबनान में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें दागीं। उसने दो दर्जन से अधिक अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया, जिनमें इराकी कुर्दिस्तान और खाड़ी देशों के ठिकाने शामिल थे। दोहा, दुबई और मनामा जैसे शहरों में भी हमले हुए। इस्राइल ने अधिकांश मिसाइलों को नष्ट कर दिया, लेकिन पूरे देश में सायरन बजते रहे। इस जवाबी कार्रवाई से क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है।

ईरान के आर्म्ड फोर्सेज के प्रमुख मौसवी, रक्षा मंत्री नासिरजादेह और IRGC प्रमुख पाकपुर जैसे वरिष्ठ कमांडरों की हत्या से ईरान की कमान और नियंत्रण व्यवस्था कमजोर हुई है। इससे उनकी जवाबी कार्रवाई की क्षमता पर भी असर पड़ सकता है।

'एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस', जिसमें हिज्बुल्लाह, हूती और इराकी मिलिशिया जैसे ईरान समर्थित समूह शामिल हैं, इस समय सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। उन्होंने अपने प्रमुख संरक्षक और रणनीतिक समन्वयक को खो दिया है। ऐसे में, वे छोटे-मोटे हमले तो कर सकते हैं, लेकिन तेहरान के सीधे निर्देश और आर्थिक मदद के बिना उनकी प्रॉक्सी वॉर (छद्म युद्ध) कमजोर पड़ सकती है। आने वाले हफ्तों में एक्सपर्ट्स असेंबली की बैठक, IRGC की स्थिति और आम लोगों के गुस्से जैसी तीन बातों पर सबकी नजर रहेगी। खामेनेई की मौत से ईरान में 36 साल से चला आ रहा राजनीतिक संतुलन टूट गया है। अब ईरान एक ऐसी स्थिति में खड़ा है जहां उसके पास एक परखी हुई काउंसिल नहीं है, विरोधी दावेदार हैं और युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं।

खामेनेई की हत्या का भारत पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। भारत के ईरान के साथ आर्थिक, रणनीतिक और कूटनीतिक रिश्ते हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल पर निर्भर है। ईरान की जवाबी कार्रवाई, शिपिंग में रुकावट और स्ट्रेट को बंद करने की धमकियों से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं। इससे भारत में ईंधन, परिवहन और दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। चाबहार पोर्ट में भारत ने लंबा निवेश किया है और 2024 में एक समझौता भी हुआ है। लेकिन, ईरान में नेतृत्व परिवर्तन, गुटबाजी और अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इस परियोजना में अनिश्चितता आ गई है। इससे पाकिस्तान को दरकिनार कर चीन के प्रभाव को कम करने की भारत की रणनीति भी प्रभावित हो सकती है।

कूटनीतिक स्तर पर भारत हमेशा एक नाजुक संतुलन बनाए रखता है। भारत के विदेश मंत्रालय ने इस घटना पर गहरी चिंता जताई है और बातचीत की अपील की है। ईरान के दिल्ली स्थित दूतावास ने सार्वजनिक रूप से शोक व्यक्त किया है, जबकि कश्मीर और लखनऊ में शिया समुदाय ने विरोध प्रदर्शन किए हैं। कुल मिलाकर, खामेनेई की मौत से ईरान और आसपास के क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है। तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और क्षेत्रीय तनाव में वृद्धि हो सकती है। भारत की कूटनीति इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान का नया नेता कौन बनता है और उसका रवैया कैसा रहता है।