Micro cap Stocks Greed Liquidity And The Truth Of The Long Haul Know The Risks Before Investing
माइक्रो-कैप शेयर: लालच, लिक्विडिटी और लंबी दूरी का सच
Contributed by: — विजय केडिया|नवभारत टाइम्स•
माइक्रो-कैप शेयरों में निवेश निवेशकों को आकर्षित कर रहा है। इन छोटी कंपनियों के बड़े सपने होते हैं। हालांकि, इनमें निवेश में लिक्विडिटी की कमी एक बड़ा जोखिम है। बाजार की तेजी में यह कमी महसूस नहीं होती, पर मंदी में निवेशक फंस सकते हैं। हर माइक्रो-कैप शेयर सफल नहीं होता।
भारतीय शेयर बाज़ार में माइक्रो-कैप शेयरों का क्रेज बढ़ रहा है, जहाँ निवेशक बड़ी कमाई की उम्मीद में पैसा लगा रहे हैं। तीन दशकों के अनुभव वाले एक निवेशक ने बताया है कि हर तेज़ी के दौर में एक ऐसा सेगमेंट होता है जो लोगों का ध्यान खींचता है, और आज यह भूमिका माइक्रो-कैप निभा रहे हैं। म्यूचुअल फंडों और आम निवेशकों ने पिछले कुछ सालों में इन शेयरों में भारी निवेश किया है, जिससे इनकी हिस्सेदारी कई गुना बढ़ गई है। यह आकर्षण इसलिए है क्योंकि छोटी कंपनियाँ बड़े सपने देखती हैं और सही चुनाव पर वे स्मॉल-कैप और मिड-कैप बन सकती हैं। लेकिन, इस चमक-दमक के पीछे एक बड़ा भ्रम छिपा है।
निवेशक अक्सर माइक्रो-कैप शेयरों की छोटी साइज़ और बड़े सपनों से आकर्षित होते हैं। उन्हें लगता है कि ये कंपनियाँ आगे चलकर बड़ी बनेंगी और उन्हें मालामाल कर देंगी। यह सोच बिल्कुल सही हो सकती है, लेकिन यहीं पर सबसे बड़ी गलती होने की संभावना भी होती है। जैसा कि कहा गया है, ‘जो दिखता है, वही पूरा सच नहीं’। माइक्रो-कैप में सबसे बड़ा खतरा कीमतों के उतार-चढ़ाव से ज़्यादा लिक्विडिटी (तरलता) का है। जब बाज़ार ऊपर जा रहा होता है और सब कुछ अच्छा चल रहा होता है, तब शेयर आसानी से बिक जाते हैं और खरीदार भी मिल जाते हैं। लेकिन जैसे ही बाज़ार का मिजाज बदलता है, यही शेयर निवेशकों को फंसा लेते हैं।थोड़ी सी बिकवाली भी इन शेयरों की कीमतों को तेज़ी से नीचे गिरा सकती है। यह समझना ज़रूरी है कि हर माइक्रो-कैप कंपनी सफल नहीं होती। अक्सर कुछ शेयरों के असाधारण रिटर्न पूरे सेगमेंट की अच्छी छवि बना देते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इस वर्ग की ज़्यादातर कंपनियाँ निवेशकों के सब्र की परीक्षा लेती हैं और कई बार तो उनकी पूंजी भी डुबो देती हैं। यहाँ प्रदर्शन में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है। कुछ शेयर 10 से 20 गुना तक का रिटर्न दे सकते हैं, जबकि कई शेयर सालों तक अपनी शुरुआती कीमत को भी पार नहीं कर पाते। इसलिए, माइक्रो-कैप में निवेश करते समय ‘स्टॉक सेलेक्शन’ यानी सही शेयर चुनना सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
आजकल कई स्मॉल-कैप और मल्टी-कैप फंड भी अपने पोर्टफोलियो में माइक्रो-कैप शेयरों का एक अच्छा हिस्सा रखते हैं। यह रणनीति तब तक ठीक है जब तक निवेशक इसके जोखिमों को अच्छी तरह समझते हों। चिंता तब पैदा होती है जब निवेशक सिर्फ़ हाल के रिटर्न को देखकर पैसा लगा देते हैं। इस मामले में नियामकों की भूमिका अहम हो जाती है, लेकिन इससे भी ज़्यादा ज़िम्मेदारी निवेशक की खुद की है। उन्हें यह समझना चाहिए कि बाज़ार में हर तेज़ी हमेशा के लिए नहीं रहती।
माइक्रो-कैप कंपनियाँ छोटी होती हैं, लेकिन उनके सपने बड़े होते हैं। यह बात निवेशकों को बहुत लुभाती है। वे सोचते हैं कि अगर उन्होंने सही समय पर किसी छोटी कंपनी में निवेश कर दिया, तो वह कंपनी बड़ी होकर उन्हें मालामाल कर देगी। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई बीज बोना और फिर एक विशाल वृक्ष की उम्मीद करना। लेकिन हर बीज पेड़ नहीं बनता, और हर माइक्रो-कैप कंपनी स्मॉल-कैप या मिड-कैप नहीं बनती।
लिक्विडिटी का मतलब है कि आप किसी शेयर को कितनी आसानी से खरीद या बेच सकते हैं। माइक्रो-कैप शेयरों में अक्सर लिक्विडिटी कम होती है। इसका मतलब है कि अगर बाज़ार में गिरावट आती है और आप अपने शेयर बेचना चाहते हैं, तो आपको खरीदार आसानी से नहीं मिलेंगे। इससे आपकी कीमतें और भी तेज़ी से गिर सकती हैं। यह एक तरह से फँस जाने जैसा है, जहाँ आप निकलना चाहते हैं लेकिन निकल नहीं पाते।
यह भी समझना ज़रूरी है कि माइक्रो-कैप में निवेश करना जुए जैसा नहीं है, लेकिन इसमें बहुत ज़्यादा रिसर्च और समझ की ज़रूरत होती है। कुछ निवेशक सिर्फ़ दूसरों की बातें सुनकर या किसी एक शेयर के बड़े रिटर्न की कहानी सुनकर निवेश कर देते हैं। यह बहुत खतरनाक हो सकता है। आपको कंपनी के बिजनेस मॉडल, मैनेजमेंट, भविष्य की योजनाओं और बाज़ार की स्थिति को अच्छी तरह समझना चाहिए।
म्यूचुअल फंडों का काम होता है निवेशकों के पैसे को अलग-अलग शेयरों में निवेश करना। जब वे माइक्रो-कैप में निवेश करते हैं, तो वे यह मानकर चलते हैं कि कुछ कंपनियाँ अच्छा प्रदर्शन करेंगी। लेकिन अगर आप किसी फंड में निवेश कर रहे हैं, तो आपको यह जानना चाहिए कि उस फंड का कितना हिस्सा माइक्रो-कैप में लगा है और उसके क्या जोखिम हैं। सिर्फ़ फंड के पिछले रिटर्न को देखकर निवेश करना एक बड़ी भूल हो सकती है।
अंत में, यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि शेयर बाज़ार में निवेश हमेशा जोखिम भरा होता है, खासकर माइक्रो-कैप सेगमेंट में। इसलिए, सोच-समझकर और पूरी जानकारी के साथ ही निवेश करें।